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नई दिल्ली, 26 मई (हि.स.)। उच्चतम न्यायालय ने लॉ पढ़ने वाले छात्रों को कम उपस्थिति (अटेंडेंस) के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोकने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने रोक लगाने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले का असर देश की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी पर पड़ रहा है। कोई भी छात्र अनिवार्य उपस्थिति पूरा करना नहीं चाहता है। जो पास कर चुके हैं वे भी छात्रों का समर्थन कर रहे हैं। सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्ता बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) से पूछा कि आपने उच्च न्यायालय के आदेश को पहले क्यों नहीं चुनौती दी। तब बीसीआई चेयरमैन और वरिष्ठ वकील मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि ये हमारी ओर से गलती है।
दरअसल, तीन नवंबर, 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि किसी भी लॉ पढ़ने वाले छात्रों को कम उपस्थिति के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा। उच्च न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अनिवार्य उपस्थिति नियमों में संशोधन करने का निर्देश दिया था। उच्च न्यायालय के इस आदेश को नरसी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है।
उच्च न्यायालय 2016 में एमिटी यूनिवर्सिटी के एक लॉ स्टूडेंट सुशांत रोहिल्ला के आत्महत्या मामले पर सुनवाई कर रही थी। सुशांत रोहिल्ला की उपस्थिति कम होने की वजह से उसे एक सेमेस्टर की परीक्षा में शामिल नहीं होने दिया गया। सुनवाई के दौरान एमिटी यूनिवर्सिटी की ओर से पेश वकील ने कहा था कि सुशांत रोहिल्ला के आत्महत्या में उनकी कोई गलती नहीं है। उन्होंने कहा था कि सुशांत के माता-पिता को कम उपस्थिति के बारे में अवगत करा दिया गया था।
ये मामला पहले उच्चतम न्यायालय में पहुंचा था। उच्चतम न्यायालय ने 14 मार्च 2017 को इस मामले को सुनवाई के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ट्रांसफर कर दिया था। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लिया था। सुशांत लॉ के तीसरे वर्ष का छात्र था और उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। उसने 10 अगस्त 2016 को अपने घर में ही खुदकुशी कर ली थी। सुशांत के दोस्त की चिट्ठी पर उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में संज्ञान लिया था। उसके दोस्त ने एमिटी यूनिवर्सिटी को आत्महत्या के लिए उकसाने का केस चलाने की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान इस मामले के एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ वकील दायन कृष्णन ने कोर्ट को बताया था कि अलग-अलग संस्थानों में छात्रों के आत्महत्या की खबरें हैं। उसके बाद कोर्ट ने उन्हें इस मामले पर एक नोट दाखिल करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने एमिटी लॉ यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया था कि वो इस मामले में सुशांत रोहिल्ला के परिजनों को मुआवजा देने पर अपना रुख स्पष्ट करें।
हिन्दुस्थान समाचार/संजय
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हिन्दुस्थान समाचार / वीरेन्द्र सिंह