Enter your Email Address to subscribe to our newsletters

बांकुड़ा, 26 मई (हि. स.)। पश्चिम बंगाल में वाम शासन के दौर में पंचायत चुनाव में भाजपा प्रत्याशी बनने की कीमत एक युवक को 33 वर्षों तक चुकानी पड़ी। बांकुड़ा जिले के इंदास ब्लॉक के कुशमुड़ी गांव निवासी विमलचंद्र बोड़ा को वर्ष 1993 में पंचायत चुनाव लड़ने के बाद कथित राजनीतिक प्रताड़ना के कारण अपना घर छोड़ना पड़ा था। अब राज्य में बदले राजनीतिक माहौल के बीच वह पहली बार अपने पैतृक गांव लौट सके हैं।
विमल बोड़ा ने बताया कि जब पश्चिम बंगाल में वाम दलों का दबदबा था, उस समय भाजपा का संगठन बेहद कमजोर माना जाता था। इसके बावजूद उन्होंने पंचायत चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने का साहस दिखाया। चुनाव समाप्त होने के बाद उन्हें तत्कालीन सत्ताधारी दल के समर्थकों के कथित उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और गांव छोड़ना पड़ा।
उन्होंने कहा कि घर छोड़ने के बाद कई महीनों तक इधर-उधर भटकते रहे। बाद में हुगली जिले के आरामबाग स्थित गोपीनाथपुर इलाके में जाकर बस गए। वहीं मजदूरी का काम किया, विवाह हुआ और परिवार बसाया। हालांकि, कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई।
विमल का आरोप है कि वर्ष 2011 में राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भी वह गांव लौटने का साहस नहीं जुटा सके। उनके अनुसार, उस समय भी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं पर दबाव और आतंक का माहौल बना हुआ था। इस कारण करीब तीन दशक तक वह अपने गांव और पैतृक घर से दूर रहे।
इंदास के भाजपा विधायक निर्मलकुमार धाड़ा को जब विमल की स्थिति की जानकारी मिली तो उन्होंने उन्हें गांव वापस लाने की पहल की। सोमवार शाम विमल बोड़ा आरामबाग से अपने पैतृक गांव पहुंचे, जहां विधायक स्वयं मौजूद रहकर उनका स्वागत किया।
विधायक निर्मलकुमार धाड़ा ने कहा कि जब हमारे पास कुछ भी नहीं था, तब ऐसे कार्यकर्ता ही पार्टी की ताकत थे। विमल बोड़ा जैसे समर्पित कार्यकर्ता वाम शासन में प्रताड़ित हुए और बाद में तृणमूल शासन में भी भय के माहौल का सामना करते रहे। करीब 33 वर्षों तक वह अपने घर नहीं लौट सके।
उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों ने विमल को अपने गांव लौटने का साहस दिया है और गांव के लोगों ने भी उनका स्वागत किया।
अपने पैतृक मिट्टी के घर के सामने खड़े विमल बोड़ा भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि अपनी मिट्टी और अपना गांव छोड़कर कोई बाहर नहीं रहना चाहता। परिस्थितियों ने मजबूर कर दिया था। पहले वामपंथियों और बाद में तृणमूल के दौर में भय का माहौल था। आज अपने घर लौटकर बेहद खुशी हो रही है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता