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शिमला, 12 मई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी को निलंबित करने से पहले विभाग द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी करना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि निलंबन अपने आप में कोई सजा नहीं माना जाता, यह विभागीय जांच की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने एक कर्मचारी की याचिका ख़ारिज करते हुए यह टिप्पणी की। यह मामला याचिकाकर्ता रवि द्वारा दायर की गई याचिका से जुड़ा था। रवि ने विभाग की ओर से जारी अपने निलंबन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि उनके खिलाफ जो कारण बताए गए हैं, वे पूरी तरह निराधार हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि आउटसोर्स कर्मचारियों को वेतन भुगतान करने की जिम्मेदारी उनकी नहीं थी, इसके बावजूद उन्हें निलंबित कर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि विभाग ने निलंबन आदेश जारी करने से पहले उन्हें कोई कारण बताओ नोटिस नहीं दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि जब यह स्थापित कानून है कि निलंबन कोई दंड नहीं होता, तो फिर इस आधार पर याचिका किस तरह से स्वीकार की जा सकती है।
अदालत ने माना कि विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान कर्मचारी को निलंबित किया जा सकता है और इसके लिए पहले से कारण बताओ नोटिस देना हर मामले में जरूरी नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह वह चरण नहीं है, जहां न्यायालय इस बात पर विचार करे कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं या गलत। कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय प्राधिकारी चाहे तो वह याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय जांच चला सकता है और जांच के दौरान तथ्यों की पड़ताल की जाएगी। इस स्तर पर अदालत आरोपों की सत्यता पर फैसला नहीं दे सकती। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रवि की याचिका खारिज कर दी।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा