समाज सुधार के नाम पर धर्म की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिएः सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, 12 मई (हि.स.)। सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के 14वें दिन उच्चतम न्यायालय ने कहा कि समाज सुधार के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत धर्म की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान
समाज सुधार के नाम पर धर्म की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिएः सुप्रीम कोर्ट


नई दिल्ली, 12 मई (हि.स.)। सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई के 14वें दिन उच्चतम न्यायालय ने कहा कि समाज सुधार के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत धर्म की स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान बेंच ने आज सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की।

सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता ने कहा कि हिंदू धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा मूर्ति पूजा का अधिकार है। अगर आप उन्हें इससे वंचित करते हैं, तो आप उन्हें धर्म का पालन करने से ही वंचित कर देते हैं। तब जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर आप संविधान के अनुच्छेद 25 (1) के तहत प्राप्त स्वतंत्रता का उल्लंघन या हनन नहीं कर सकते। इस पर जयदीप गुप्ता ने कहा कि आप धर्म को पूरी तरह से खोखला नहीं कर सकते, लेकिन अगर उसमें बदलाव की जरुरत है और अगर ऐसा किया जाता है, तो कोई भी व्यक्ति इसके विरुद्ध अनुच्छेद 25 (1) का उपयोग नहीं कर सकता।

इसके पहले 06 मई को सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने उस तरीके पर सवाल उठाया था जिसमें सुधारवादियों के एक समूह ने उच्चतम न्यायालय के 1962 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित बहिष्कार की परंपरा को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने कहा था कि उस फैसले की समीक्षा के लिए पुनर्विचार याचिका या क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है, अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका कानूनसम्मत नहीं है।

बता दें कि 28 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब ये नहीं है कि उसके संचालन का कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती है। कोर्ट ने कहा था कि ऐसी संस्थाओं के कामकाज के एक व्यवस्था होनी चाहिए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस एजे मसीह, जस्टिस पीबी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 28 सितंबर 2018 को 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के साथ काफी समय से भेदभाव होता रहा है। महिला पुरुष से कमतर नहीं है। एक तरफ हम महिलाओं को देवी स्वरुप मानते हैं दूसरी तरफ हम उनसे भेदभाव करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि बायोलॉजिकल और फिजियोलॉजिकल वजहों से महिलाओं के धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया जा सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार/संजय

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रभात मिश्रा