- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, किंतु जब यह प्रतिस्पर्धा तथ्यों, नीतियों और विचारों से हटकर कटु, उग्र और विभाजनकारी भाषा में बदल जाए, तब समझ लीजिए वह लोकतंत्रीय चेतना को आहत करने लगी है। कहना होगा कि क
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