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डॉ. प्रभात ओझा
ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिसे ‘दलाल’ कहा था, उसी पाकिस्तान ने जंग रुकवा दी। प्रारम्भिक तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पोस्ट से जरूर यह लगता है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, मैं दो हफ्तों के लिए ईरान पर बमबारी और हमले को रोकने पर सहमत हूं।” ट्रंप ने कहा कि यह निर्णय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर से बातचीत के बाद लिया गया। उन दोनों ने मुझसे नियोजित हमलों को टालने का आग्रह किया था।
राष्ट्रपति का यह निर्णय वाला बयान, उस समय सीमा के सिर्फ एक घंटा पहले आया, जिसके बाद उन्होंने ‘एक पूरी सभ्यता का नामोनिशान मिटा देने’ की धमकी दी थी। जो भी हो, युद्ध एक सभ्य दुनिया के लिए महापाप ही होता है। इसे शुरू करने के 40वें दिन अचानक शांति का ख्याल आ जाने के पीछे कुछ तो हुआ होगा। उस तय लाइन पर आगे बढ़ने के लिए गुरुवार 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में बातचीत करने का निर्णय हुआ। दुनिया इससे राहत की सांस लेगी, इसके संकेत मिलने शुरू हो गये। युद्धविराम घोषित होते ही कच्चे तेल की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल नीचे आ गया। शुरुआती घंटों में ही भारत के शेयर बाजार में भी रौनक देखने को मिलने लगी थी।
खबर पहले भी थी कि पाकिस्तान बातचीत में मध्यस्थता कर रहा है। फर्क यह है कि अब आधिकारिक रूप से दोनों पक्षों के घोषित प्रतिनिधि आमने-सामने बैठेंगे। स्वाभाविक है कि इतनी भयावह तल्खी के बाद सहमति के लिए लेनदेन भी होगी। इस ‘दलाली’ में मध्यस्थ को क्या मिलेगा, यह भी देखना है। अब मध्यस्थता अथवा दलाली मुख्य प्रश्न नहीं है। प्रश्न है कि किन परिस्थितियों में संघर्ष रोकना पड़ा। शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के कहने भर से यह हो गया, प्रारम्भिक तौर पर दुनिया में इसे कोई नहीं मान रहा। अभी तो राष्ट्रपति ट्रंप की बेचारगी और लाचारी ही दिख रही है। इसे समझने के लिए युद्ध विराम पर इजराइल के पहले बयान पर नजर डालनी चाहिए। बयान के एक हिस्से में कहा गया है, “इजराइल अमरीका की उस कोशिश का समर्थन करता है जिसमें यह सुनिश्चित करना है कि ईरान अब परमाणु हथियार, मिसाइल या आतंक का खतरा न बने। न अमरीका के लिए, न इजराइल के लिए, न ईरान के अरब पड़ोसियों के लिए और न ही दुनिया के लिए।”
दरअसल, ईरान खतरा न बने, यह तो बातचीत के रुख से तय होगा। अभी वह अपने उन पड़ोसियों के लिए खतरा जरूर है, जहां अमरीकी अड्डे हैं। ईरान ने युद्ध के दौरान साफ कर दिया था कि वह अपने ‘पड़ोसी भाइयों’ पर नहीं बल्कि उनके यहां अमरीकी ठिकानों पर हमले कर रहा है। यही नहीं, ईरान ने ट्रंप की ताजा धमकी के बाद मध्य एशिया के विभिन्न देशों में मौजूद महत्त्वपूर्ण पुलों, जैसे कुवैत का शेख अल अहमद अल सबाह सी ब्रिज, सऊदी अरब और बहरीन को जोड़ने वाला किंग फहद कॉजवे, जार्डन का किंग हुसैन ब्रिज, दामिया और अब्दौलन ब्रिज को निशाने पर रखा था। उसने इजराइल के परमाणु ठिकानों और मध्य एशिया की कई रिफाइनरीज पर भी हमले की योजना बना ली। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि ये सम्बंधित देश ट्रंप पर युद्ध रोकने का दबाव बढ़ा रहे थे।
बातचीत किस दिशा में जाएगी, इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल तो अमरीका की लाचारी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आए होर्मुज प्रस्ताव से भी समझा जा सकता है। ट्रंप का अल्टीमेटम खत्म होने से पहले सुरक्षा परिषद में होर्मुज खोलने पर बहरीन की तरफ से आया प्रस्ताव गिर गया। इस पर वोटिंग में रूस और चीन ने वीटो कर दिया। और तो और, जिस पाकिस्तान के मध्यस्थ होने की खबर है, वह मतदान से गैरहाजिर रहा। पाकिस्तान इस समय सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य है। परिणाम यह रहा कि होर्मुज को खुलवाने के अमरीकी इरादे को धक्का पहुंचा। बातचीत के परिणाम का इंतजार करना होगा, अभी तो अमरीका अब तक दुश्मन रहे ईरान के पुनर्निर्माण में मदद करने का भी वचन दे रहा है। चालाक और अस्थिर ट्रंप आगे क्या करें, इसका भी भरोसा नहीं। फिलहाल तो वे लाचार ही लग रहे हैं।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश