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शिमला, 06 मार्च (हि.स.)। शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस) के राष्ट्रपति निवास परिसर में शुक्रवार को गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर चित्रदीर्घा का उद्घाटन किया गया। इसके साथ ही संस्थान में 27वां डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्मृति व्याख्यान भी गरिमापूर्ण वातावरण में आयोजित किया गया। इसमें देश-विदेश के विद्वानों और शिक्षाविदों ने भाग लिया।
संस्थान परिसर में स्थापित यह नई चित्रदीर्घा गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के जीवन, विचारों और रचनात्मक योगदान को समर्पित है। चित्रदीर्घा में टैगोर के जीवन के विभिन्न चरणों, समकालीन महान व्यक्तित्वों के साथ उनके संवाद और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी उपस्थिति से जुड़े दुर्लभ चित्रों को विषयानुसार प्रदर्शित किया गया है। इसके माध्यम से आगंतुकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को गुरुदेव के बहुआयामी व्यक्तित्व को समझने का अवसर मिलेगा।
चित्रदीर्घा की एक दीवार गुरुदेव की साहित्यिक, कलात्मक और नाट्य कृतियों को समर्पित है, जिसमें उनकी प्रमुख रचनाओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों की जानकारी दी गई है। वहीं दूसरी दीवार पर शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन में उनके शैक्षिक प्रयोगों और सांस्कृतिक गतिविधियों की झलक प्रस्तुत की गई है। इसमें शिक्षा, कला, संगीत, योग, ध्यान और सामुदायिक जीवन से जुड़े उनके प्रयासों को भी दर्शाया गया है।
इस अवसर पर संस्थान में 27वां डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन स्मृति व्याख्यान भी आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की अध्यक्ष प्रो. शशि प्रभा कुमार ने की, जबकि मुख्य व्याख्यान अशोका विश्वविद्यालय, सोनीपत के दर्शनशास्त्र विभाग के विशिष्ट प्रोफेसर और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित विद्वान प्रो. अरिंदम चक्रवर्ती ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की बौद्धिक विरासत और भारतीय दर्शन की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह स्मृति व्याख्यान श्रृंखला देश और दुनिया के प्रतिष्ठित विद्वानों को समकालीन बौद्धिक विमर्श से जोड़ने का महत्वपूर्ण मंच है।
अपने व्याख्यान में प्रो. अरिंदम चक्रवर्ती ने बृहदारण्यक उपनिषद के मधुकांड की दार्शनिक व्याख्या करते हुए आदर्शवाद और यथार्थवाद के संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन, जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के विचारों और गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के मानवतावादी चिंतन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय दार्शनिक परंपरा में मानवता और सह-अस्तित्व की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में दुनिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है, जिनमें वैश्विक राजनीतिक तनाव, आर्थिक असमानता और पर्यावरणीय संकट शामिल हैं। ऐसे समय में मानवता पर आधारित दार्शनिक दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने भारतीय उपनिषदों की बहुलतावादी और समन्वयकारी सोच को वर्तमान वैश्विक विमर्श के लिए महत्वपूर्ण बताया।
प्रो. शशि प्रभा कुमार ने कहा कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान जैसे संस्थान केवल शोध और अकादमिक गतिविधियों के केंद्र ही नहीं हैं, वे भारतीय ज्ञान परंपरा, मानवीय मूल्यों और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को आगे बढ़ाने का भी काम करते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा