बाल यौन शोषण कांड में ऐतिहासिक फैसला: दो दोषियों को फांसी
बांदा, 20 फ़रवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद में नाबालिग बच्चों के साथ हुए संगठित यौन शोषण के अत्यंत जघन्य मामले में विशेष न्यायालय पॉक्सो एक्ट, बांदा ने कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायालय ने मुख्य दोषी निलम्बित जेई राम भवन और उस
बाल यौन शोषण कांड में ऐतिहासिक फैसला: दो दोषियों को फांसी


बांदा, 20 फ़रवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जनपद में नाबालिग बच्चों के साथ हुए संगठित यौन शोषण के अत्यंत जघन्य मामले में विशेष न्यायालय पॉक्सो एक्ट, बांदा ने कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। न्यायालय ने मुख्य दोषी निलम्बित जेई राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई है।

लोक अभियोजक सौरभ सिंह के अनुसार, इस मामले की जांच सीबीआई, दिल्ली द्वारा की गई थी। जिसमें अक्टूबर 2020 में रिपोर्ट दर्ज की गई थी। अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक धारा सिंह ने अदालत में प्रभावी पैरवी की। जांच में सामने आया कि आरोपित दम्पति, जो थाना नरैनी क्षेत्र के निवासी हैं, चित्रकूट में किराये के मकान में रहकर करीब 33 नाबालिग बच्चों का यौन शोषण करते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने बच्चों के आपत्तिजनक वीडियो बनाकर उन्हें विदेशों में भेजा। जांच एजेंसियों के अनुसार, लगभग 2 लाख से अधिक वीडियो तैयार कर करीब 47 देशों में भेजे गए, जिनका उपयोग ब्लैकमेलिंग और अन्य आपराधिक गतिविधियों में किया गया।

मुकदमे के दौरान कुल 74 गवाह अदालत में पेश किए गए। सभी साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर न्यायालय ने दोनों आरोपितों को दोषी ठहराते हुए कहा कि यह अपराध “दुर्लभतम श्रेणी” का है, इसलिए इन्हें तब तक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए।

अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), 506 (आपराधिक धमकी), 120 बी (आपराधिक साजिश), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67-बी तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 की विभिन्न धाराओं के तहत दोष सिद्ध किया। साथ ही मृत्युदंड के अलावा आजीवन कारावास, कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजा भी सुनाई गई। न्यायालय ने सभी पीड़ित बच्चों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी पारित किया है। साथ ही जुर्माने की राशि भी पीड़ितों को दिए जाने के निर्देश दिए गए हैं।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि ऐसे अपराध न केवल बच्चों का जीवन बर्बाद करते हैं, बल्कि समाज की नैतिक नींव को भी हिला देते हैं। यदि ऐसे मामलों में कठोर दंड नहीं दिया गया, तो यह समाज के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

कोर्ट ने राज्य सरकार और सम्बंधित विभागों को निर्देश दिया कि पीड़ित बच्चों के पुनर्वास, मनोवैज्ञानिक उपचार, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। यह फैसला अपर सत्र न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा द्वारा सुनाया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले छह महीनों में यह तीसरा मामला है, जिसमें उन्होंने दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है।

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हिन्दुस्थान समाचार / अनिल सिंह