माघ मेला भारतीय लोक संस्कृति की आत्मा : डॉ. पुष्पेंद्र प्रताप सिंह
प्रयागराज, 09 जनवरी (हि.स.)। गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम तट पर माघ मास में लगने वाला माघ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बोलियों, लोकगीतों, लोककथाओं और जनविश्वासों का एक विशाल सांस्कृतिक मंच भी है। माघ मेला भारतीय लोक सं
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प्रयागराज, 09 जनवरी (हि.स.)। गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम तट पर माघ मास में लगने वाला माघ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बोलियों, लोकगीतों, लोककथाओं और जनविश्वासों का एक विशाल सांस्कृतिक मंच भी है। माघ मेला भारतीय लोक संस्कृति की आत्मा है। अवधी, भोजपुरी, ब्रज और बुंदेली जैसी जनभाषाओं में माघ मेले का वर्णन सहज, भावुक और अत्यंत चित्रात्मक रूप में मिलता है।

यह बातें उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित साहित्यिक-सांस्कृतिक संगोष्ठी में आयुर्वेदाचार्य डॉ. पुष्पेंद्र प्रताप सिंह ने शुक्रवार को व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि लोककथाओं में माघ मेला मोक्ष, तपस्या और चमत्कार का स्थल बनकर उभरता है। साधु-संतों की सिद्धियां, कल्पवासियों की कथाएं और संगम-स्नान से जीवन-परिवर्तन की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी लोकमानस में प्रचलित हैं। वर्तमान समय में भले ही मेले का स्वरूप बदला हो, लेकिन आज भी लोग सुकून, शांति, आध्यात्मिक अनुभूति और दिव्य ऊर्जा की प्राप्ति के लिए संगम तट पर आते हैं।

इस अवसर पर साहित्यकार एवं इलाहाबाद डिग्री कॉलेज विधि विभाग के सहायक आचार्य डॉ. श्लेष गौतम ने कहा कि तीर्थराज प्रयाग, जहां प्रतिवर्ष माघ मेला, छह वर्ष में अर्धकुम्भ और बारह वर्ष में महाकुम्भ का आयोजन होता है, का उल्लेख वेदों, पुराणों, उपनिषदों, रामायण, रामचरितमानस, महाभारत सहित लोक साहित्य और अनेक जनभाषाओं में मिलता है।

कार्यक्रम के अंतर्गत ब्रह्मनाद कला महोत्सव प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। जिसमें गायन विधा में 10 एवं चित्रकला में 25 प्रतिभागियों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में राज्य ललित कला अकादमी के सदस्य रविन्द्र कुशवाहा एवं वरिष्ठ चित्रकार डॉ. कावेरी विज शामिल रहे। कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने सभी वक्ताओं को अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर तथा प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रभाकर त्रिपाठी ने किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र