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धर्मशाला, 08 जनवरी (हि.स.)। पूर्व महापौर धर्मशाला देवेन्द्र जग्गी ने कहा कि मनरेगा योजना के अंतर्गत पहले ग्राम सभा को वास्तविक अधिकार प्राप्त थे। गांव की ग्राम सभा द्वारा बैठकों में स्थानीय जरूरतों को देखते हुए स्वयं प्रस्ताव पारित किए जाते थे और सेल्फ पास के माध्यम से डंगा लगाने, खेतों की सुरक्षा, कच्चे रास्तों के निर्माण, पानी की निकासी, नालियों की मरम्मत तथा जल स्रोतों के संरक्षण जैसे छोटे लेकिन अत्यंत जरूरी विकास कार्य करवाए जाते थे। इससे गांवों में तुरंत काम शुरू हो जाता था, मजदूरों को समय पर रोजगार मिलता था और पलायन पर भी प्रभावी रोक लगती थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा में किए गए नए बदलावों के बाद यह पूरी प्रक्रिया लगभग समाप्त कर दी गई है।
वीरवार को यहां जारी एक प्रेस बयान में कांग्रेस नेता ने कहा कि ग्राम सभाओं की शक्तियों को सीमित कर दिया गया है और निर्णय लेने का अधिकार गांवों से छीनकर ऊपर के स्तर पर केंद्रित कर दिया गया है। अब गांव के लोग स्वयं यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनके क्षेत्र में किस प्रकार का विकास कार्य प्राथमिकता में होना चाहिए। इससे पंचायती राज व्यवस्था की मूल भावना को गहरा आघात पहुंचा है।
उन्होंने कहा कि मनरेगा केवल रोजगार उपलब्ध कराने की योजना नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने, गांवों में बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने और लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम रहा है। ग्राम सभा को कमजोर करने का अर्थ है ग्रामीण लोकतंत्र को कमजोर करना और आम जनता की आवाज को दबाना।
केंद्र सरकार के इन फैसलों से प्रदेश सरकारों पर भी अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। राज्यांश को बढ़ाकर 40 प्रतिशत करना उन राज्यों के लिए भारी संकट पैदा कर रहा है जो पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसका सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास कार्यों पर पड़ रहा है।
हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया