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रांची, 07 जनवरी (हि.स.)। झारखंड भाषायी विविधता का जीवंत उदाहरण है। राज्य में पांच जनजातीय और चार क्षेत्रीय भाषाएं हैं और 24 जिलों को किसी एक भाषा में नहीं पिरोया जा सकता। बहुभाषी शिक्षा ही झारखंड की सांस्कृतिक पहचान, समावेशिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आधारशिला है। यह बातें उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार ने होटल चाणक्या बीएनआर, में बुधवार को आयोजित बहुभाषी शिक्षा पर राष्ट्रीय कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने मातृभाषा आधारित शिक्षा के वैज्ञानिक और भावनात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि मां ही बच्चे की पहली शिक्षिका होती है, इसी कारण मदर टंग की अवधारणा शिक्षा का मूल आधार है। यदि बुनियादी शिक्षा सरल, रोचक और व्यवहारिक नहीं होगी, तो वह केवल ब्लैकबोर्ड तक सीमित रह जाएगी और जागरूक नागरिकों का निर्माण नहीं कर पाएगी।
जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त होने के कगार पर
मंत्री ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं और बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देना ही इन भाषाओं के संरक्षण का पहला और सबसे सशक्त प्रयास है। खोरठा भाषा का उदाहरण देते हुए मंत्री ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से ही भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियां और पहचान जीवित रह सकती हैं।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में पलाश परियोजना राज्य के केवल 8 जिलों में संचालित है, जबकि इसे शेष 16 जिलों तक विस्तार देने की जरूरत है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विभागीय सचिव से आग्रह किया कि खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में सशक्त रूप से सम्मिलित किया जाए।
इस अवसर पर बहुभाषी शैक्षणिक सामग्रियों के निर्माण में योगदान देने वाली छात्रा और शिक्षकों को सम्मानित करते हुए मंत्री ने कहा कि राज्य स्तर पर शिक्षकों को दिया गया सम्मान अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगा। साथ ही, देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस दो दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव से प्राप्त अनुभव झारखंड की स्कूली शिक्षा को नई दिशा देगा।
कार्यक्रम में कई शिक्षाविद सहित विभाग के कई अधिकारी सहित अन्य मौजूद थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / Vinod Pathak