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उदयपुर, 05 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान की तितली जैवविविधता के अध्ययन में एक ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। राज्य में पहली बार पॉइंटेड सिलिएट ब्लू नामक दुर्लभ तितली का आधिकारिक रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। यह महत्वपूर्ण खोज तितली शोधकर्ता मुकेश पंवार द्वारा उदयपुर क्षेत्र में की गई है, जिससे न केवल राजस्थान की तितली जैवविविधता समृद्ध हुई है, बल्कि शुष्क और कांटेदार वन पारिस्थितिकी के अध्ययन को भी नई दिशा मिली है। पॉइंटेड सिलिएट ब्लू, जिसका वैज्ञानिक नाम Anthene lycaenina है, अब तक राजस्थान में दर्ज नहीं की गई थी। इस खोज के साथ ही राज्य में पहली बार इस प्रजाति के लिए Caesalpinia bonduc को लार्वल होस्ट पौधे के रूप में प्रमाणित किया गया है। यह पौधा स्थानीय रूप से कटकरंज, गजला, मेंढ़ल और पांशुल जैसे नामों से जाना जाता है।
यह ऐतिहासिक खोज 2 नवंबर 2025 को जयसमंद–उदयपुर रोड पर जयसमंद अभयारण्य के गेट के सामने दर्ज की गई। तितली का कैटरपिलर Caesalpinia bonduc पौधे के फूलों की कलियों पर पाया गया, जिसे सागवाड़ा, जिला डूंगरपुर निवासी तितली शोधकर्ता मुकेश पंवार ने एकत्र किया। इसके बाद इसे सुरक्षित रूप से घर पर रखकर तितली का संपूर्ण जीवन चक्र पूर्ण किया गया। तितली के जीवन चक्र के अनुसार 9 नवंबर 2025 को प्यूपा का निर्माण हुआ, जबकि 17 नवंबर 2025 को वयस्क तितली का इक्लोजन हुआ। इस प्रकार पूरा जीवन चक्र लगभग 15 दिनों में पूर्ण हुआ। वयस्क तितली का पंख फैलाव 24 से 29 मिलीमीटर दर्ज किया गया। राजस्थान से इस तितली की पहली उपस्थिति को वैज्ञानिक मान्यता भी प्राप्त हो चुकी है। यह शोधकार्य बटरफ्लाई रिसर्च सेंटर, भीमताल उत्तराखंड के निदेशक पीटर स्मैटचेक के सान्निध्य में पूर्ण किया गया और इसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका बायोनॉट्स के दिसंबर 2025 अंक में शोधपत्र के रूप में प्रकाशित किया गया।
यह खोज कई कारणों से विशेष मानी जा रही है। पहली बार राजस्थान से इस प्रजाति का रिकॉर्ड दर्ज हुआ है और Anthene प्रजाति के लिए Caesalpinia bonduc को राज्य में नया लार्वल होस्ट पौधा प्रमाणित किया गया है। सामान्यतः यह तितली दक्षिणी भारत के पूर्वी घाट क्षेत्र में पाई जाती है, जबकि दक्षिणी गुजरात और मध्यप्रदेश में भी इसकी उपस्थिति दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार कटकरंज पौधे के फैलाव और अनुकूल परिस्थितियों के कारण इस तितली का आवास क्षेत्र विस्तारित हुआ माना जा रहा है।
तितलियां और पतंगे पारिस्थितिक संकेतक के रूप में जानी जाती हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति उनके लार्वा के भोज्य पौधों पर निर्भर करती है। ऐसे में स्थानीय वनस्पतियों का संरक्षण स्वस्थ पर्यावरण और मजबूत भोजन श्रृंखला के लिए अत्यंत आवश्यक माना गया है। यह खोज शुष्क पर्णपाती और कांटेदार झाड़ीदार क्षेत्रों में तितलियों की पारिस्थितिकी को समझने में नई जानकारी प्रदान करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में भविष्य में और भी दुर्लभ तितली प्रजातियों की खोज की संभावनाएं बढ़ेंगी।
उल्लेखनीय है कि मुकेश पंवार, निवासी सागवाड़ा जिला डूंगरपुर, पेशे से शिक्षक हैं और लंबे समय से तितलियों के अध्ययन में सक्रिय शोधकर्ता हैं। उन्होंने वर्ष 2020 में पीटर स्मैटचेक के सहयोग से भारत में नई तितली प्रजाति स्पियलिया जेब्रा की खोज, उसका जीवन चक्र और विस्तार क्षेत्र दर्ज किया था। इसी तरह वर्ष 2023 में अलवर क्षेत्र से गोल्डन बर्ड विंग तितली की महत्वपूर्ण खोज भी उनके द्वारा की गई थी।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता