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-कल्पवास का महात्म्य ही माघ मेले का प्राण तत्व : डॉ राजेंद्र त्रिपाठी
प्रयागराज, 04 जनवरी (हि.स.)। सदियों से चली आ रही लोक आस्था की अविरल यात्रा हर वर्ष संगम तट पर ठहरकर माघ उत्सव के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करती है। यही परम्परा माघ मेला और प्रत्येक छह वर्ष में कुम्भ मेले के रूप में देश-दुनिया को प्रयागराज की ओर आकर्षित करती है। संगम की रेती केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और संवारने का जीवंत माध्यम भी है। उक्त विचार वरिष्ठ लेखक, चिंतक एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन केंद्र के कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा ने व्यक्त किए।
डॉ. चोपड़ा उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में आयोजित माघ मेले के अवसर पर आयोजित ‘चलो मन गंगा-यमुना तीर’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘शब्द-ब्रह्म’ संगोष्ठी में ‘लोक आस्था एवं जन विश्वास का महोत्सव’ पर विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि माघ मेले में जन विश्वास की असंख्य कथाएं मिलती हैं, जो न केवल जीवन में ऊर्जा का संचार करती हैं, बल्कि हमें जीवन जीने की कला भी सिखाती हैं। मेले के दौरान होने वाला कल्पवास आस्था से आगे बढ़कर जीवन प्रबंधन की एक अनुपम पाठशाला है। यही कारण है कि देश-विदेश के विश्वविद्यालयों के शोधार्थी कल्पवास की प्रक्रिया और उसके प्रभावों के अध्ययन हेतु प्रयागराज आते हैं। यह मेला हमारी लोक संवेदनाओं को सहेजते हुए बदलते समय में समाज को जीवन की दिशा दिखाता रहेगा।
इस अवसर पर डॉ. श्लेष गौतम ने कहा कि महाकुम्भ और माघ मेला हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक तथा लोक आस्था एवं जन विश्वास के महोत्सव हैं। जिन्हें समेकित दृष्टि से समझने पर ही उनके व्यापक महत्व, विविधता और वैचारिकी को जाना जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज माघ मेला और कल्पवास की परम्परा वैश्विक संवाद का विषय बन चुकी है। क्योंकि भारत की ज्ञान, दर्शन, चिंतन और लोक जीवन की परम्पराएं सदैव विश्व को आकर्षित करती रही हैं। संगम की त्रिवेणी रेती पर तंबुओं का यह विस्तार एक आध्यात्मिक लोक का साकार रूप है, जहां वेद, वेदांत, उपनिषद और महाकाव्यों के संदर्भों के साथ जीवन और चेतना पर गहन विमर्श होता है। असली त्रिवेणी आत्मिक शुद्धि का है।
साहित्य और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में माघ मेला विषय पर अपने विचार रखते हुए प्रो. राजेंद्र त्रिपाठी ‘रसराज’ ने तीर्थराज प्रयाग के पौराणिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने ब्रह्मपुराण और स्कंद पुराण के साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रह्मा द्वारा सर्वोत्कृष्ट यज्ञ संपादित किए जाने के कारण इस स्थल का नाम प्रयाग पड़ा। समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ होने से इसे प्रयागराज कहा गया। स्कंद पुराण के अनुसार माघ माह में समस्त तीर्थों का समागम प्रयाग में होता है, जो लोक आस्था का मूल कारण है। कल्पवास का महात्म्य ही माघ मेले का प्राण तत्व है और यही आस्था आज भी परम्परा के रूप में जीवित है।
कार्यक्रम का शुभारम्भ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा एवं उपस्थित वक्ताओं द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। केंद्र निदेशक ने कहा कि “शब्द-ब्रह्म भारतीय संस्कृति की उस चेतना का प्रतीक है, जहां लोक आस्था, साहित्य और जीवन दर्शन एक-दूसरे से संवाद करते हैं। ‘चलो मन गंगा-यमुना तीर’ के माध्यम से हम इसी सांस्कृतिक विरासत को संवाद और विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे हैं।” इसके बाद मंत्रोचारण प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसमें आशीष पाल, समिष्ठा पाल, परिधि घोष, प्रसुन घोष, प्रबुद्ध पाल, यथार्थ चौबे व गौरी ने भाग लिया। केन्द्र निदेशक ने सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रमोद द्विवेदी ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम सलाहकार श्रीमती कल्पना सहाय ने किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र