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गिरीश्वर मिश्र
सार्वजनिक जीवन में शिष्ट आचरण या भद्र व्यवहार की मर्यादाओं का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। संयत व्यवहार और संयम के साथ बर्ताव पर भारतीय समाज में बल दिया जाता रहा है। इससे संवाद और सकारात्मक विचार-विनिमय के लिए अवसर निर्मित होता है। आज परिस्थितियाँ तेज़ी से बदल रही हैं और आधुनिकता के नाम पर उच्छृंखलता की तरफ कदम बढ़ने में देर नहीं लगाती है । संसद तक में इस तरह के दृश्य आए दिन दिख रहे हैं। यह सब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर होता है जो संविधान द्वारा प्रदत्त एक महत्वपूर्ण अधिकार है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि लोकतंत्र में नागरिकों की गरिमा की रक्षा के लिए इसका विशेष महत्व है और इसी हर कीमत पर रक्षा होनी ही चाहिए ।
विगत वर्षों में आई डिजिटल क्रांति ने संचार और संवाद का एक नया और चुनौती भरा वातावरण खड़ा कर दिया है। उसके बीच सोशल मीडिया की उभरती सर्वातिक्रामी भूमिका ने अभिव्यक्ति की शक्ति को अत्यंत प्रभावी बना दिया है। उसके साथ कई आर्थिक और नैतिक सवाल भी जुड़ गए हैं। अब तो मीडिया में प्रभावी लोगों (मीडिया इन्फ्लुएंसर्स) की एक नई विशिष्ट श्रेणी ही बन गई है। इनमें से अधिकांश लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपने नफे के लिए विधिवत व्यवसायीकरण करने में जुट गए हैं। दूसरे शब्दों में वे कमाई करने के लिए अभिव्यक्ति की खूब छूट ले रहे हैं। अपने कार्यक्रमों के दौरान उनके द्वारा की गई टिप्पणियां कई बार भारत के विविधतापूर्ण समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाती भी दिखती हैं। वे लोगों को अखर जाती हैं। उनके शिकारों में अकसर विकलांग, महिलाएं, बच्चे, वरिष्ठ नागरिक और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग शामिल रहते हैं।
खास बात यह है कि प्रभावशाली लोग जो कहते हैं वह आज के दौर में बड़ा मायने रखने लगा है। उनका दिया प्रत्यक्ष और परोक्ष संदेश एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित करता दिख रहा है। ताजे घटनाक्रम में इससे जुड़े एक मामले में उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह पॉडकास्ट जैसे ऑनलाइन शो सहित सोशल मीडिया पर आचरण को विनियमित करने के लिए राष्ट्रीय प्रसारकों और डिजिटल एसोसिएशन के परामर्श से व्यापक दिशा-निर्देश तैयार कर ले आए। उनके अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विभिन्न समुदायों के समाज में सम्मान के साथ रहने के समान रूप से महत्वपूर्ण अधिकार के बीच संतुलन बनाये रखने के लिए इन दिशा-निर्देशों को जारी करना बड़ा जरूरी हो गया है। उच्चतम न्यायालय ने समय रैना समेत सोशल मीडिया में सक्रिय हास्य कलाकारों के खिलाफ विकलांग व्यक्तियों के बारे में असंवेदनशील चुटकुले बनाकर “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग” करने के मामले की सुनवाई कर रही थी । सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कांत ने यह तल्ख टिप्पणी की कि दिव्यांग व्यक्तियों के बारे में असंवेदनशील चुटकुले बनाकर उन्हें मुख्यधारा में लाने का संवैधानिक उद्देश्य पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया गया है।
यह सही है कि हास्य हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है, उसे होना भी चाहिए लेकिन उसकी भी हद होती है। हल्केपन से संवेदनशीलता का हनन कदापि नहीं होना चाहिए। इसलिए इस दिशा में जरूरी दिशा-निर्देश इस तरह बनाए जाने की जरूरत है कि उल्लंघन की अवस्था में प्रभावी कारवाई संभव हो सके। जब तक प्रभावी परिणाम नहीं सुनिश्चित किए जाते, लोग अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं। परिणाम, हुए नुकसान के अनुपात में होने चाहिए। ये सिर्फ ऊपरी तौर पर खानापूरी के लिए औपचारिकता नहीं हो सकते। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं लगना चाहिए परंतु प्रस्तावित दिशा-निर्देश ऐसे जरूर हों जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आहत करने वाले कथन या वक्तव्य के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच सकें। आवश्यकता है कि सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को संवेदनशील बनाया जाए। अगर कोई दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है तो उसे उसकी जिम्मेदारी भी लेनी होगी।
वस्तुत: अभिव्यक्ति कई प्रकार की होती है। इसको मुख्य रूप से तीन मुख्य श्रेणियों- स्वतंत्र अभिव्यक्ति, व्यावसायिक अभिव्यक्ति और निषिद्ध अभिव्यक्ति में विभाजित कर देखा जा सकता है। आजकल के माहौल में व्यावसायिक (कमर्शियल) अभिव्यक्ति और निषिद्ध (प्रोहिबिटेड) अभिव्यक्ति दोनों ही एक जैसी होती जा रही हैं। इस समय विकलांग व्यक्तियों से जुड़ा मामला प्रकाश में आया है और उस पर उच्चतम न्यायालय गम्भीरता से विचार कर रहा है । भविष्य में महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों आदि से जुड़े मामले भी आ सकते हैं। कोई भी किसी का मजाक उड़ाना शुरू कर सकता है। ऐसे में लोकतांत्रिक परिवेश में सोशल मीडिया पर जागरुकता और संवेदनशीलता फैलाने की सख्त जरूरत है। ताजे मामले में न्यायालय ने हास्य कलाकारों को अपने शो के जरिए बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का व्यवसायीकरण करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समाज के कुछ वर्गों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
(लेखक,महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद