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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
असम की राजनीति में अचानक एक ‘लेटर बम’ फूटा है। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद (ए) के प्रमुख अरशद मदनी ने दावा किया कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक चिट्ठी लिखी थी। उस चिट्ठी में उन्होंने साफ आग्रह किया था कि हिमंता बिस्वा सरमा को कांग्रेस से टिकट न दिया जाए, क्योंकि वे “आरएसएस मानसिकता वाले” हैं और असम में आग लगाने का काम कर सकते हैं। वस्तुत: अब इस बयान को सुनते ही राजनीति गरमा उठी है। दरअसल, मदनी के इस कथन ने सीधे-सीधे कांग्रेस की टिकट वितरण प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर दिया। क्या कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का टिकट इस तरह धार्मिक संगठनों या मौलवियों की सिफारिशों पर निर्भर करता है? और अगर ऐसा है तो कांग्रेस में मेहनत कर रहे हिंदू कार्यकर्ताओं की स्थिति क्या होगी? ये प्रश्न अचानक पूरे देश की बहस का हिस्सा बन गया है।
अरशद मदनी ने यह बयान किसी सामान्य मौके पर नहीं, बल्कि एक सभा में दिया। उनका यह दावा केवल अतीत का किस्सा नहीं बल्कि वर्तमान की राजनीति पर भी तीखा प्रहार है। भाजपा ने इसे हाथोंहाथ लिया और कांग्रेस पर एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया है। वहीं, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस बयान का जवाब उसी तेवर में दिया, जिसके लिए वे जाने जाते हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पहले ही उन्हें धमकी दे चुके थे और अब मदनी ने चेतावनी दी है। “जितनी ज्यादा धमकी दोगे, उतना ही ज्यादा असम के लोग उठ खड़े होंगे और मुकाबला करेंगे।” सरमा ने साफ कहा कि वे अवैध रूप से बसे लोगों को बेदखल करना जारी रखेंगे और मूल निवासियों के भूमि अधिकार सुरक्षित करेंगे। उन्होंने मदनी और राहुल गांधी दोनों को असम के लोगों से लड़ने की चुनौती दी और ऐलान किया कि “हम उन्हें हरा देंगे।”
असल में मदनी का यह बयान उस पृष्ठभूमि में आया है जब असम में बेदखली अभियानों पर जमीयत और भाजपा सरकार आमने-सामने हैं। पिछले कुछ महीनों में गोलपाड़ा, धुबरी और नलबाड़ी जिलों में हजारों परिवारों को बेदखल किया गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 8,000 से ज्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं। जमीयत का दावा है कि 50,000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए। जमीयत ने राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक को पत्र लिखकर इस अभियान को रोकने की मांग की है। यहां तक कि जमीयत ने प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय भी लगाए और राहत सामग्री भी बांटी।
असम सरकार का तर्क है कि ये अभियान अवैध कब्जों को हटाने और मूल निवासियों के अधिकार सुरक्षित करने के लिए हैं। मुख्यमंत्री सरमा का कहना है कि बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठिये जमीन पर कब्जा कर रहे हैं और असम की अस्मिता के लिए यह खतरा है। यही कारण है कि वे इसे किसी भी कीमत पर रोकने के पक्ष में नहीं हैं। जमीयत और सरमा सरकार की यह भिड़ंत केवल बेदखली तक सीमित नहीं रही। अरशद मदनी ने जब बेदखली अभियानों की तुलना गााज से की, तो भाजपा ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी तक की मांग कर डाली। भाजपा का कहना था कि इस तरह का बयान असमिया जनता की भावनाओं को आहत करता है। सरमा ने भी मदनी और उनके गुटों को “irrelevant” करार देते हुए कहा कि असम की राजनीति इन्हीं पुराने मजहबी संगठनों की दया पर नहीं चल सकती।
यही नहीं, असम की जमीन और पहचान पर हाल में कई विवादास्पद बयान आए। महिला अधिकार कार्यकर्ता और पूर्व योजना आयोग सदस्य सैयदा हामीद ने कहा कि “सारी जमीन अल्लाह की है।” इस पर सरमा ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई और इसे राष्ट्रविरोधी मानसिकता बताया। उन्होंने कहा कि यह अवैध प्रवासियों को वैध ठहराने की कोशिश है। उधर, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने भी अवैध प्रवास और सीएए-एनआरसी जैसे मुद्दों को लेकर बड़ा आंदोलन खड़ा करने की घोषणा की है। उन्होंने भूख हड़ताल, मशाल जुलूस और मानव श्रृंखला जैसे कार्यक्रमों की घोषणा की है। यह संकेत है कि असम में जमीन, पहचान और नागरिकता का सवाल चुनावी राजनीति से कहीं ज्यादा गहराई से समाज की नसों में बैठा हुआ है।
इस पूरे प्रकरण का एक बड़ा राजनीतिक अर्थ यह है कि कांग्रेस की छवि एक बार फिर “मुस्लिम तुष्टिकरण” वाली पार्टी के रूप में सामने आई है। मदनी ने जो बोला है उससे तो आज यही समझ आता है कि कांग्रेस का टिकट वितरण मौलवियों और मजहबी नेताओं की इच्छा पर निर्भर है। निश्चित ही यह कांग्रेस के लिए ही नहीं स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी खतरे की घंटी है। यदि कांग्रेस सचमुच किसी मौलाना के दबाव में टिकट देती है, तो यह पार्टी के भीतर लोकतंत्र पर उठता बड़ा सवाल है। कांग्रेस के हिंदू कार्यकर्ताओं को यह संदेश जाता है कि उनकी वर्षों की मेहनत, संघर्ष और निष्ठा का कोई महत्व नहीं, क्योंकि अंततः टिकट का फैसला किसी बाहरी मजहबी संगठन की सिफारिश से तय होता है।
यहां यह याद रखना जरूरी है कि हिमंता बिस्वा सरमा खुद कभी कांग्रेस में थे। 2014 में उन्होंने तरुण गोगोई से मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ी और 2015 में भाजपा में शामिल हुए। 2016 में वे फिर से विधानसभा पहुंचे और सर्बानंद सोनोवाल की सरकार में मंत्री बने। 2021 में वे असम के मुख्यमंत्री बने। यानी कांग्रेस ने एक ऐसे नेता को गंवा दिया, जो आज भाजपा की राजनीति का सबसे ताकतवर चेहरा है। अगर मदनी की चिट्ठी और दबाव ने वाकई सरमा की टिकट पर असर डाला था, तो कांग्रेस का नुकसान कितना बड़ा हुआ, यह आज साफ दिखता है। इस परिदृश्य का निचोड़ यही है कि अरशद मदनी का बयान कांग्रेस के लिए केवल एक विवादित वक्तव्य नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यप्रणाली पर गहरी चोट है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कांग्रेस के टिकट वास्तव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय होते हैं या फिर बाहरी धार्मिक संगठनों की पसंद-नापसंद से? अगर कांग्रेस इस पर स्पष्ट और ठोस जवाब नहीं देती, तो यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पर लगने वाले तमाम तुष्टीकरण के आरोप सच ही हैं।
असम जैसे संवेदनशील राज्य में, जहां अवैध प्रवास, नागरिकता और भूमि का मुद्दा दशकों से राजनीति का केंद्र रहा है, वहां कांग्रेस का यह कमजोर पड़ता रुख बता रहा है कि आज यहां जो इस तरह की समस्याएं हैं, इन सभी का जिम्मेदार यदि कोई है तो वह कांग्रेस ही है। फिलहाल तो यही समझ आ रहा है कि अरशद मदनी के ‘लेटर बम’ ने कांग्रेस की असल सच्चाई सामने लाकर रख दी है। बहुसंख्यक हिन्दू समाज के दम पर सत्ता में आने वाली कांग्रेस का दिल मुसलमानों के लिए धड़कता है, कहना होगा कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कहीं से भी यह अच्छी स्थिति नहीं है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी