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जबलपुर, 05 अगस्त (हि.स.)। मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामलों में बुधवार को हाई कोर्ट में अंतिम सुनवाई पूरी हो गई। करीब ढाई घंटे से अधिक चली सुनवाई में आरक्षण की संवैधानिक वैधता, 50 प्रतिशत की सीमा, ओबीसी की आबादी और आरक्षण लागू करने से जुड़े विभिन्न कानूनी पहलुओं पर अंतिम तर्क रखे गए। प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायाधीश विनय सराफ की विशेष युगलपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
लंबी सुनवाई के दौरान पक्षकारों की ओर से आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रविधानों, पूर्व के न्यायिक निर्णयों और उपलब्ध आंकड़ों का विस्तार से उल्लेख किया गया। मध्य प्रदेश में वर्ष 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने के बाद से यह मामला न्यायिक विचाराधीन है। सुनवाई के दौरान 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा, ओबीसी की आबादी, पिछड़ेपन के आंकड़े, क्रीमीलेयर और नियुक्तियों में लंबित पदों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस हुई।
ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने बुधवार को अपनी अंतिम दलीलों में 27 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखने की मांग की थी। उन्होंने तत्कालीन सरकार द्वारा अक्टूबर 2019 में दाखिल 555 पेज के जवाब का हवाला देते हुए कहा था कि उसमें ओबीसी की आबादी 51 प्रतिशत बताई गई थी। उन्होंने आरक्षण समाप्त करने की स्थिति में सरकारी स्कूलों से कक्षा एक से 12वीं तक पढ़े विद्यार्थियों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता देने का सुझाव भी रखा था।
हाईकोर्ट आने वाले दिनों में इस मामले में अपना फैसला सुना सकता है। अंतिम सुनवाई पूरी होने के बाद न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने सभी पक्षों के अधिवक्ताओं को उनके द्वारा रखी गई कानूनी दलीलों के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि इस पूरी सुनवाई का अनुभव कोर्ट के लिए भी सीखने वाला रहा।
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हिन्दुस्थान समाचार / विलोक पाठक