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शिमला, 19 जुलाई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश के सेब बागीचों में इस बार मौसम की मार और कम उत्पादन की चिंता के बीच अब फफूंद जनित रोगों का खतरा भी बढ़ने लगा है। शिमला जिले के रोहड़ू, जुब्बल और कोटखाई क्षेत्रों में अल्टरनेरिया और मार्सोनिना रोग तेजी से फैल रहे हैं। किन्नौर और कुल्लू के कुछ इलाकों से भी इन रोगों के लक्षण सामने आने लगे हैं। बागवानों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सेब की फसल को और अधिक नुकसान हो सकता है।
इन रोगों के कारण सेब के पेड़ों की पत्तियां समय से पहले पीली होकर झड़ रही हैं। पत्तियां गिरने से पेड़ों की प्रकाश संश्लेषण की क्षमता कम हो रही है, जिससे फलों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा। इसका असर सेब के आकार, रंग और गुणवत्ता पर पड़ने की आशंका है।
बागवानों का कहना है कि इस वर्ष पहले ही सेब का उत्पादन उम्मीद से कम रहने की संभावना है। ऐसे में रोग का बढ़ता प्रकोप उनकी चिंता और बढ़ा रहा है।
भारतीय किसान संघ के प्रदेशाध्यक्ष और प्रगतिशील बागवान सुरेश ठाकुर ने सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेने की मांग की है। उनका कहना है कि हिमाचल की अर्थव्यवस्था में सेब का करीब पांच हजार करोड़ रुपये का योगदान है और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। ऐसे में रोग की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक आधार पर तुरंत रणनीति बनाई जानी चाहिए।
सुरेश ठाकुर का कहना है कि रोहड़ू और आसपास के जंगलों में उगने वाले फेकड़े नाम के जंगली पौधों पर भी इस रोग का व्यापक असर दिखाई दे रहा है। उनका मानना है कि संक्रमण वहीं से सेब के बागीचों तक पहुंच रहा है। उन्होंने बागवानी विभाग से जंगलों का भी सर्वे कराने, संक्रमण के स्रोत की पहचान करने और उसके अनुसार नियंत्रण की योजना तैयार करने की मांग की है।
बागवानों ने बाजार में उपलब्ध फफूंदनाशक दवाओं की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कई दवाओं और स्प्रे का इस्तेमाल करने के बाद भी रोग पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो रहा है। उन्होंने बागवानी विभाग से विभिन्न कंपनियों की ओर से बेची जा रही दवाओं की गुणवत्ता की जांच कराने की मांग की है, जिससे यह पता चल सके कि कहीं कम प्रभाव वाली दवाओं के कारण बागवानों को नुकसान तो नहीं हो रहा।
बागवानों ने बागवानी विभाग, डॉ. वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी और कृषि विज्ञान केंद्रों से प्रभावित क्षेत्रों का तुरंत दौरा करने की भी मांग की है।
उनका कहना है कि विशेषज्ञों की ओर से रोग प्रबंधन, प्रभावी दवा और बचाव के उपायों पर विस्तृत सलाह जल्द जारी की जानी चाहिए। उनका मानना है कि समय पर वैज्ञानिक सलाह और उचित उपचार मिलने से संक्रमण को दूसरे क्षेत्रों में फैलने से रोका जा सकता है।
अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट रोग में शुरुआत में पत्तियों पर छोटे काले या गहरे भूरे धब्बे दिखाई देते हैं।
बाद में ये धब्बे गोल आकार लेकर बड़े हो जाते हैं और पत्तियां समय से पहले गिरने लगती हैं। वहीं मार्सोनिना लीफ ब्लॉच में मानसून के दौरान पत्तियों पर काले धब्बे बनते हैं, जो बाद में भूरे-ग्रे रंग के हो जाते हैं और उनके किनारे लाल या बैंगनी दिखाई देते हैं। गंभीर संक्रमण की स्थिति में पेड़ों का समय से पहले पर्णपात हो सकता है, जिससे मौजूदा फसल के साथ अगले वर्ष की उत्पादन क्षमता पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा