प्रयागराज, 16 मई (हि.स)। जब घुंघरुओं की थाप पर इतिहास बोलने लगे और भावों में संस्कृति की आत्मा उतर आए, तभी कथक अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देता है। उक्त विचार भारतीय शास्त्रीय नृत्य की इसी जीवंत परम्परा को शब्द देते हुए वरिष्ठ कथक नृत्यांगना विद
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