बीबीएन प्रदूषण की मार झेलने को अभिशप्त
कुलभूषण उपमन्यु हिमाचल प्रदेश में औद्योगिक विकास की रीढ़ माना जाने वाला बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़ (बीबीएन) क्षेत्र बहुत से नकारात्मक कारणों से भी चर्चा में रहता आया है। वर्तमान में यह क्षेत्र प्लास्दा में किण्वन उद्योग लिमिटेड के एपीआई (सक्रिय भेषज
कुलभूषण उपमन्यु


कुलभूषण उपमन्यु

हिमाचल प्रदेश में औद्योगिक विकास की रीढ़ माना जाने वाला बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़ (बीबीएन) क्षेत्र बहुत से नकारात्मक कारणों से भी चर्चा में रहता आया है। वर्तमान में यह क्षेत्र प्लास्दा में किण्वन उद्योग लिमिटेड के एपीआई (सक्रिय भेषजीय सामग्री) संयंत्र के कारण चर्चा में है। इस प्लांट के कारण आसपास के 4-5 किलोमीटर क्षेत्र में जनता का दुर्गन्ध के कारण सांस लेना दूभर हो गया है और प्लांट का प्रदूषित जल नदी-नालों में छोड़ने के कारण जल भी प्रदूषित हो गया है। अत्यधिक भूजल दोहन के कारण आसपास के क्षेत्रों में हैंडपंप सूखने लग पड़े हैं। इस संयंत्र को प्रतिदिन 6.7 किलो लीटर पानी उपयोग की स्वीकृति है। लोगों का कहना है कि यह संयंत्र काफी ज्यादा भूजल दोहन कर रहा है, जिसके कारण पहले से लगे हैंडपंप सूखने लगे हैं।

संयंत्र के दुष्प्रभावों को बारीकी से समझने से पहले बीबीएन की ऐतिहासिक लापरवाह संस्कृति पर नजर डाल लेते हैं। 2025 तक कार्यरत 2919 इकाइयों में से 87 पर्यावर्णीय प्रदूषण रोकने के लिए जरूरी प्रावधानों का उलंघन करते हुए पकड़ी गईं और उनसे 3.2 करोड़ रुपये प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वसूला। 27 इकाइयों और चार स्टोन क्रशरों की बिजली काटी गई। प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगाए गए उपकरणों का समय-समय पर सुधार करना पड़ता है, जो नहीं किया गया और सामयिक रखरखाव के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से नवीकरण करवाना पड़ता है, जो नहीं करवाया गया।

बीबीएन में 308 इकाइयां लाल श्रेणी की हैं, जिनमें ये उल्लंघन ज्यादा पाए गए। प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का सुधार या रखरखाव पैसा बचाने के लिए ही ये लोग नहीं करते हैं और इससे कई बार भ्रष्टाचार भी जुड़ा रहता है। कैरियर पॉइंट यूनिवर्सिटी हमीरपुर के एक अध्ययन में यह सामने आया की भूजल में सल्फेट, तांबा, लोहा, स्वीकृत स्तर से ज्यदा पाया गया। अम्लीयता भी अधिक पाई गई। वायु सूचकांक खतरनाक स्तर 324 मापा गया। जाहिर है कि जहां उद्योग विकास के लिए लगाये जाते हैं वहां औद्योगिक प्रदूषण को व्यापारिक हितों को मुख्यता देने वाले उद्योगपति, कोई महत्व नहीं देते हैं और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को लागू करने में घोर लापरवाही बरतते हैं। इससे एक ओर कुआं और दूसरी ओर खाई वाली स्थिति बन जाति है।

उद्योग न लगाएं तो बेरोजगारी और लगाएं तो प्रदूषण जनित लापरवाहियों से जीवन दुखी और असंभव। इसलिए हिमालय को प्रदूषणकारी लाल श्रेणी की औद्योगिक गतिविधियों से दूर रखने की हिमालय नीति अभियान और सहयोगी सामाजिक जन आन्दोलन की वकालत करते रहे हैं ताकि यह क्षेत्र पर्यटन और मैदानी प्रदूषण से थके हारे लोगों के लिए सामयिक विश्राम स्थल के रूप में बचा रहे। अगर हिमालय भी धूल, धुएं और अशुद्ध जल का घर बन जाएगा तो मानवता को विश्रांति कहां मिलेगी। सवाल है कि देश के लिए हिमालय द्वारा दी जा रही पर्यावरणीय सेवाओं को होने वाली अपूरणीय हानि की भरपाई कैसे होगी। स्थानीय समुदायों को प्रदूषण के कारण होने वाली स्वास्थ्य, आजीविका और असुविधा का गुनहगार कौन होगा। ये सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं।

अब सक्रिय भेषज सामग्री को समझने का प्रयास करते हैं। ये वह सामग्रियां हैं जो किसी दवाई में वांछित असर या गुण प्रदान करती हैं। ये रोगी को देने के लिए तैयार दवाई का लगभग आधा हिस्सा हैं और दूसरा आधा है एक्ससेपिएंट्स या सहायक तत्व। ये रासायनिक स्तर पर निष्क्रिय होते हैं, जबकि इनसे मिल कर रासायनिक तौर पर सक्रिय भेषज सामग्रियां या घटक ही दवाई को वांछित गुण प्रदान करती हैं। इन सक्रिय भेषज सामग्रियों को बनाने की प्रक्रिया भी काफी पेचीदा होती है जिसमें अनेक रासायनिक पदार्थों का प्रयोग होता है, जिससे इन रसायनों से प्रदूषण फैलने का भी खतरा बना रहता है। अत: रसायन मार्ग आधारित सक्रिय भेषज घटकों के निर्माण के बजाय अब कई दवा कंपनियां बैक्टिरिया या खमीर आधारित किण्वन मार्ग को अधिमान दे रही हैं।

इसमें विभिन्न भेषजीय तत्वों को विभिन्न सूक्ष्म जीवियों के माध्यम से उपचारित करके किण्वन (खमीरीकरण) से विभिन्न रासायनिक यौगिक प्राप्त कर लिए जाते हैं, जिन्हें एपीआई या सक्रिय भेषजीय घटक कहा जाता है। यह तो ठीक है कि रासायनिक मार्ग के मुकाबले किण्वन ( खमीरीकरण) मार्ग से कम प्रदूषण होता है किन्तु यह मार्ग भी कदाचित निरापद नहीं है। खमीरीकरण में दुर्गन्ध पैदा होती है जिसका सही उपचार न किया जाए तो आसपास के निवासियों का जीना दूभर हो जाता है। इस प्रक्रिया में काफी मात्रा में अपशिष्ट पैदा होता है, जिसके निपटान के लिए निर्धारित मानदंडों का प्रयोग न करके अपशिष्ट उपचार संयंत्र लगा कर भी उनको पैसा बचाने के लिए संचालित ही नहीं किया जाता। आक्सीकरण द्वारा अपघटनीय और केवल जैवीय रूप से अपघटनीय कार्बनिक पदार्थ भी बिना यह तय किए कि इनके अपघटन के लिए कौन सी विधि प्रयोग में लाई जाएगी, बिना संशोधित किए ही खुले छोड़ दिए जाते हैं, जो एपीआई एकत्रित करने योग्य नहीं बचते और एंटीबायोटिक अपशिष्ट भी बिना संशोधित किए जल, और मिटटी प्रदूषण द्वारा पर्यावरण और मानव एवं अन्य पशु जगत के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा के नाम पर बहुत सी जानकारियों को छुपाया जाता है इसके कारण अपशिष्ट प्रबन्धन पर निगरानी रखना कठिन हो जाता है। इन सबका एकत्रित विषाक्त प्रभाव कितना पड़ रहा है, इसका अभी तक पूर्ण आकलन ही नहीं किया गया है। अत: ठोस और तरल या अर्ध तरल अपशिष्ट पदार्थों का संशोधन, उनके खतरनाक विषाक्त स्तर के आकलन के अनुसार कुशलता पूर्वक किया जाना चाहिए वरना यह लापरवाही पर्यावरण, मानव और जीव स्वास्थ्य के लिए बड़ा हानिकारक साबित हो सकता है। एक सदइच्छा से किया गया प्रयास स्थानीय समाज के लिए घातक साबित हो सकता है। अत: उद्योगपतियों को तमाम सुविधाएं देने के बाद भी उनकी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और लोगों की समस्याओं को हल करने के लिए शीघ्र ही कार्रवाई की जानी चाहिए।

(लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष और पर्यावरणविद् हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद