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जौनपुर,12 मार्च (हि.स.)। यूपी के जौनपुर स्थित वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों ने ऑयस्टर मशरूम के उत्पादन को बढ़ाने के लिए एक नई और प्रभावी तकनीक विकसित की है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्था Elsevier की प्रतिष्ठित पत्रिका Bioresource Technology Reports में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ है, जिसका इम्पैक्ट फैक्टर चार से अधिक है।इस नई तकनीक में बरमूडा घास और प्रयुक्त मशरूम सब्सट्रेट (एसएमएस) के मिश्रण का उपयोग किया गया है। अध्ययन के अनुसार इस मिश्रण से न केवल मशरूम की पैदावार में वृद्धि होती है, बल्कि उसकी पोषण गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार होता है।यह शोध बायोटेक्नोलॉजी विभाग के शोधकर्ता रोशन लाल गौतम ने विभागाध्यक्ष प्रो. राम नारायण के निर्देशन में किया है। शोध के दौरान बरमूडा घास और एसएमएस को अलग-अलग अनुपात में मिलाकर मशरूम की खेती की गई। अध्ययन में पाया गया कि 80 प्रतिशत बरमूडा घास और 20 प्रतिशत एसएमएस का संयोजन सबसे अधिक प्रभावी रहा।इस संयोजन में मशरूम के माइसीलियम का विकास तेज़ी से हुआ और केवल 16 दिनों में पूरा माइसीलियल रन पूरा हो गया। इसी अनुपात में मशरूम की कुल उपज लगभग 1711 ग्राम दर्ज की गई, जबकि इसकी जैविक दक्षता 336.4 प्रतिशत रही, जो अन्य संयोजनों की तुलना में सबसे अधिक है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि एसएमएस के उपयोग से मशरूम में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और खनिज तत्वों की मात्रा में भी वृद्धि होती है।शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक मशरूम उत्पादन को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बना सकती है। प्रयुक्त मशरूम सब्सट्रेट के पुनः उपयोग से कृषि अपशिष्ट को उपयोगी जैव उत्पाद में बदला जा सकता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक किसानों और मशरूम उत्पादकों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकती है और मशरूम आधारित कृषि को बढ़ावा देने में सहायक होगी।
हिन्दुस्थान समाचार / विश्व प्रकाश श्रीवास्तव