आईआईटी कानपुर में स्वर्ण जयंती पुनर्मिलन के तहत देश-विदेश से एकत्र हुए 1976 बैच के पूर्व छात्र, 13 करोड़ रुपये का सामूहिक योगदान
कानपुर, 09 फरवरी (हि.स.)। आईआईटी कानपुर अपने पूर्व छात्रों की उपलब्धियों और मूल्यों पर गर्व करता है। 1976 बैच का स्वर्ण जयंती पुनर्मिलन संस्थान के साथ उनके स्थायी जुड़ाव और योगदान की प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए आईआईटी कान
1976 बैच के साथ आईआईटी कानपुर निदेशक


कानपुर, 09 फरवरी (हि.स.)। आईआईटी कानपुर अपने पूर्व छात्रों की उपलब्धियों और मूल्यों पर गर्व करता है। 1976 बैच का स्वर्ण जयंती पुनर्मिलन संस्थान के साथ उनके स्थायी जुड़ाव और योगदान की प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए आईआईटी कानपुर को और सशक्त बनाएगा। यह बातें सोमवार को आईआईटी कानपुर के निदेशक प्रो. मणींद्र अग्रवाल ने कहीं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के 1976 बैच ने अपनी शिक्षा पूर्ण किए 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर स्वर्ण जयंती पुनर्मिलन का आयोजन किया। इस अवसर पर भारत सहित विदेशों से आए पूर्व छात्र परिसर पहुंचे और अपने सहपाठियों से पुनः जुड़कर पुरानी यादें ताज़ा कीं। कार्यक्रम ने पूर्व छात्रों और उनकी मातृ संस्था के बीच दशकों पुराने संबंधों को एक बार फिर मजबूत किया।

स्वर्ण जयंती समारोह के अंतर्गत 1976 बैच ने आईआईटी कानपुर की विभिन्न महत्वपूर्ण शैक्षणिक, अनुसंधान और विकासात्मक पहलों के समर्थन के लिए 13 करोड़ 40 लाख रुपये के सामूहिक योगदान का संकल्प लिया। यह योगदान संस्थान के प्रति बैच की गहरी कृतज्ञता और आईआईटी कानपुर की निरंतर प्रगति में भागीदारी की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पुनर्मिलन के दौरान पूर्व छात्रों को संस्थान के नेतृत्व, संकाय सदस्यों और वर्तमान विद्यार्थियों के साथ संवाद का अवसर मिला। साथ ही उन्होंने पिछले पांच दशकों में आईआईटी कानपुर द्वारा हासिल की गई शैक्षणिक, अनुसंधान और अवसंरचनात्मक उपलब्धियों का अवलोकन किया। इस अवसर पर पूर्व छात्रों ने 1970 के दशक में परिसर में बिताए अपने छात्र जीवन को भावुकता के साथ याद किया, जिसने उनके पेशेवर जीवन और मूल्यों को आकार दिया।

बैच की ओर से मुक्तेश पंत ने बताया कि 1976 बैच की सामूहिक योगदान की परंपरा लंबे समय से रही है। उन्होंने लगभग 25 वर्ष पूर्व किए गए एक योगदान का उल्लेख किया, जिसे विवेकपूर्ण निवेश के माध्यम से बढ़ाया गया और बाद में एलवीएडी परियोजना में उपयोग किया गया। इससे गंगवाल स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज़ एंड टेक्नोलॉजी में कृत्रिम हृदय अनुसंधान को नई दिशा मिली। स्वर्ण जयंती पर 10 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया था, जिसे पार करते हुए कुल योगदान 13 करोड़ 40 लाख रुपये तक पहुंचा।

हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप