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कहा बिना मेडिकल व ठोस जातिसूचक शब्द के नहीं चलेगा केस
प्रयागराज, 13 अक्टूबर (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कौशांबी के एस सी/ एस टी एक्ट के एक मामले में स्पेशल जज द्वारा जारी सम्मन/संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि बिना मेडिकल रिपोर्ट और बिना ठोस जातिसूचक शब्द के एस सी / एस टी एक्ट का केस नहीं चल सकता। यह आदेश जस्टिस संतोष राय ने बग्गड़़ की अपील पर दिया है।
शिकायतकर्ता फूलचंद्र धोबी ने शिकायत दायर की थी। आरोप था कि 10.मई.2023 को बग्गड़, गुल्लू, कल्लू उर्फ नौशाद, असिमुन् निशा, सोनी व रफीकुन्निशा ने जातिसूचक गाली दी और लाठी डंडों से मारपीट की और जेब से 1,500 रुपये निकाल लिए। जिस पर कोर्ट ने सम्मन जारी किया है। इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर हुई।
अपीलार्थियों ने कहा कि यह झूठा मुकदमा है। शिकायतकर्ता की ओर से राजेंद्र, निर्मल व अन्य पर हसीना सुलेमानी के अपहरण का विवाद है, उसी रंजिश में यह शिकायत दर्ज कराई गई है।
न्यायालय ने पाया कि शिकायत में यह नहीं बताया गया कि 1,500 रुपये किसने निकाले। सभी सात आरोपियों पर मारपीट का आरोप है, लेकिन कोई मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं है, यह नो-इंजरी केस है। पैसे निकालने वाला आरोप भी सुनी-सुनाई बात पर आधारित है।
एस सी एस टी एक्ट की धारा 3(1)(एस) के लिए जरूरी है कि जाति के आधार पर अपमानित करने की नीयत से ठोस जातिसूचक शब्द कहा गया हो, जो इस केस में नहीं बताया गया। धारा 3(2)(वी ए) के लिए भी जरूरी है कि शेड्यूल में वर्णित अपराध पीड़ित की जाति जानने के बावजूद किया गया हो, जिसका कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि जरूरी तत्वों के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना विधि के दुरुपयोग के समान होगा। इसलिए 06.सितंबर.2023 का सम्मन/संज्ञान आदेश निरस्त किया जाता है। अपील स्वीकार की जाती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रामानंद पांडे