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प्रयागराज, 13 अक्टूबर (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि वह सभी पुलिस अधिकारियों के लिए सर्कुलर जारी करें। इसमें चेतावनी दी जाए कि अदालत के आदेशों के अनुपालन के लिए संवाद करने वाले सरकारी वकीलों के साथ दुर्व्यवहार करना अदालत की अवमानना हो सकता है और ऐसे मामलों में कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने यह निर्देश आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय में तैनात जनसंपर्क अधिकारी राजेश कुमार सिंह के कथित दुर्व्यवहार पर कड़ी आपत्ति जताते हुए दिया।
आरोप है कि उन्होंने अदालत के आदेश के अनुपालन के संबंध में जानकारी देने पहुंचे एक अपर शासकीय अधिवक्ता के साथ बदसलूकी की।
अदालत ने पीआरओ को हिरासत में लेने का निर्देश दिया और उन्हें शाम 5 बजे तक अदालत की हिरासत में रखा। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने कहा कि सरकारी वकील अदालत के अधिकारी हैं। अदालत ने कहा कि अपर शासकीय अधिवक्ता अदालत के अधिकारी होते हैं। जब वे किसी सरकारी अधिकारी को न्यायिक आदेश के अनुपालन के लिए सूचित करते हैं, तो वे अदालत के निर्देशों के पालन में अपना कर्तव्य निभा रहे होते हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि अदालत के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए किसी अधिकारी को सूचित करने वाले सरकारी वकील के साथ दुर्व्यवहार, चाहे ऐसा करने वाला अधिकारी राज्य का शीर्ष अधिकारी ही क्यों न हो, अदालत की अवमानना का मामला बन सकता है।
एस एस पी ने पीआरओ को पद से हटाया। सुनवाई के दौरान आजमगढ़ के एस एस पी ने अदालत को बताया कि उन्होंने राजेश कुमार सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और उन्हें पीआरओ के पद से हटा दिया है। हाईकोर्ट ने एस एस पी की त्वरित कार्रवाई की सराहना की। अदालत ने एक अन्य मुद्दे पर भी विचार किया, जो हाईकोर्ट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट के अनुपालन से संबंधित था। एस एस पी ने अपने अनुपालन हलफनामे में बताया कि अपर शासकीय अधिवक्ता से प्राप्त सूचना 8 सितंबर 2026 को आवश्यक कार्रवाई के लिए रिट सेल को भेजी गई थी। बाद में यह सूचना महाराजगंज पुलिस स्टेशन पहुंची और जनरल डायरी में दर्ज की गई।
हालांकि, हलफनामे के अनुसार, उपनिरीक्षक सुभाष सिंह ने सूचना प्राप्त करने के बावजूद उसका अनुपालन सुनिश्चित करने के बजाय उसे अपने पास रख लिया। प्रारंभिक जांच में महाराजगंज थाने केएस एच ओ को भी आदेश के अनुपालन में लापरवाही का दोषी पाया गया। दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। उच्च न्यायालय ने गैर-जमानती वारंट के अनुपालन पर स्थिति स्पष्ट की एस एस पी ने अदालत से माफी मांगते हुए कहा कि उन्हें लगा था कि संबंधित जांच अधिकारी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना पर्याप्त होगा।
इस पर उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब किसी पुलिस अधिकारी को हाईकोर्ट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट प्राप्त होता है, तो उसे संबंधित व्यक्ति की गिरफ्तारी सुनिश्चित कर उसे हाईकोर्ट के समक्ष पेश करना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट के मामले में जिला अदालत जमानत दे सकती है। एस एस पी के बेदाग सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उनके खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी। हालांकि, भविष्य में हाईकोर्ट के गैर-जमानती वारंट के अनुपालन में अधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा की।
अदालत ने एस एस पी द्वारा एक व्यक्ति की दो नाबालिग बेटियों को गोद लेने के मानवीय कदम की भी सराहना की। उक्त व्यक्ति ने अपनी पत्नी और एक अन्य बच्चे की हत्या की थी, जबकि बाद में उस बच्चे की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु हो गई थी।
यह मामला सचिन यादव की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया था। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 64(1) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराओं 66 ई और 67ए के तहत मामला दर्ज था। उच्च न्यायालय ने मामले के मेरिट के आधार पर सचिन यादव की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश की प्रति आवश्यक कार्रवाई के लिए उत्तर प्रदेश के डीजीपी को भेजने का निर्देश
भी दिया।
हिन्दुस्थान समाचार / रामानंद पांडे