मुकदमा जीतने के बाद भी अपील करना पड़ा महंगा, हाई कोर्ट ने 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया
शिमला, 13 अक्टूबर (हि.स.)। निचली अदालत में मुकदमा जीतने के बाद भी उसके फैसले को चुनौती देना दो पक्षों को महंगा पड़ गया। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हमीरपुर के जमीन विवाद से जुड़े मामले में नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए अपील करने वाले पवन कुमार औ
हिमाचल हाईकोर्ट


शिमला, 13 अक्टूबर (हि.स.)। निचली अदालत में मुकदमा जीतने के बाद भी उसके फैसले को चुनौती देना दो पक्षों को महंगा पड़ गया। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हमीरपुर के जमीन विवाद से जुड़े मामले में नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए अपील करने वाले पवन कुमार और अन्य पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब निचली अदालत का फैसला किसी पक्ष के खिलाफ नहीं है, तो वह सामान्य तौर पर उस फैसले को चुनौती देने के लिए पीड़ित पक्ष नहीं माना जा सकता।

न्यायाधीश राकेश कैंथला ने यह आदेश देते हुए कहा कि जिस पक्ष के हक में निचली अदालत का फैसला आया हो, वह उसी फैसले के खिलाफ अपील नहीं कर सकता। यह विवाद हमीरपुर जिले में जमीन के विनिमय से जुड़े समझौते का था। जनक राज ने पवन कुमार और अन्य के खिलाफ जमीन पर स्थायी निषेधाज्ञा देने की मांग करते हुए सिविल मुकदमा दायर किया था। स्थायी निषेधाज्ञा का मतलब है कि अदालत किसी पक्ष को किसी काम को करने से स्थायी रूप से रोक दे।

दरअसल, निचली सिविल अदालत ने 1 अक्तूबर 2004 को जनक राज का मुकदमा खारिज कर दिया था। इस तरह फैसला पवन कुमार और अन्य के पक्ष में आया। इसके बावजूद उन्होंने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट), हमीरपुर की अदालत में अपील दायर कर दी। अपीलीय अदालत ने उनकी अपील खारिज करते हुए कहा कि जब मूल मुकदमे में वादी के दावे खारिज हो चुके हैं और प्रतिवादी जीत चुके हैं, तो वे उस फैसले से पीड़ित नहीं हैं। अदालत ने उन पर 3 हज़ार रुपये का हर्जाना भी लगाया था। इसके बाद पवन कुमार और अन्य ने हाईकोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दायर की।

हाईकोर्ट में अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों के बीच एक नया समझौता हुआ था। उनके अनुसार इस समझौते में जनक राज को जमीन पर अतिक्रमणकारी पाया गया था और उन्हें जमीन का कब्जा वापस मिलना चाहिए था। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि प्रतिवादियों ने मूल मुकदमे में कोई जवाबी दावा दायर नहीं किया था। ऐसे में वे उसी मुकदमे के आधार पर जमीन का कब्जा वापस दिलाने की मांग नहीं कर सकते थे।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि निचली अदालतों ने साक्ष्यों का आकलन करने में कोई गलती नहीं की थी। अदालत ने नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए अपीलकर्ताओं पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा