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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
हर वर्ष 9 जनवरी को मनाया जाने वाला प्रवासी भारतीय दिवस भारत और विश्वभर में बसे भारतीय समुदाय के बीच भावनात्मक, सांस्कृतिक और विकासात्मक रिश्तों को मजबूत करने का प्रतीक है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय इस दिवस की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि यह हमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े एक ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है।
9 जनवरी 1915 को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे। उनका यह लौटना प्रवासी भारतीयों के अधिकारों, संघर्षों और आत्मसम्मान को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर प्रवासी भारतीय दिवस की अवधारणा विकसित की गई।
पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने की थी शुरूआत
प्रवासी भारतीय दिवस की शुरुआत वर्ष 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में हुई थी। इसका उद्देश्य विदेशों में रह रहे भारतीयों के योगदान को पहचान देना और उन्हें भारत की विकास प्रक्रिया से जोड़ना था। उस समय यह एक नई सोच थी कि भारत अपने प्रवासी समुदाय को केवल भावनात्मक रिश्तों तक सीमित न रखकर, उन्हें आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक साझेदार के रूप में देखे। समय के साथ यह सोच और अधिक सशक्त होती गई और प्रवासी भारतीय दिवस एक ऐसे मंच के रूप में स्थापित हुआ, जहाँ नीति, निवेश, संस्कृति, शिक्षा और तकनीक जैसे विषयों पर सार्थक संवाद होने लगा।
भारत में प्रवासी भारतीयों का है महत्वपूर्ण योगदान
वर्ष 2015 से प्रवासी भारतीय दिवस के मुख्य सम्मेलन को द्विवार्षिक स्वरूप दिया गया। इसका उद्देश्य यह था कि इन सम्मेलनों से निकलने वाले विचार और पहलें केवल चर्चा तक सीमित न रहें, बल्कि उनके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त समय और अवसर मिल सके। इसी क्रम में वर्ष 2025 में 18वां प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन की थीम विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान रखी गई थी, जो यह दर्शाती है कि भारत अपनी दीर्घकालिक विकास दृष्टि में प्रवासी समुदाय को कितनी महत्वपूर्ण भूमिका देता है।
वर्ष 2026 को प्रवासी भारतीय दिवस के संदर्भ में नॉन कन्वेंशन वर्ष घोषित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि इस वर्ष कोई मुख्य राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित नहीं हो रहा है। इसके बावजूद प्रवासी भारतीय दिवस की भावना और सक्रियता में कोई कमी नहीं आई है। दुनिया भर में भारतीय दूतावासों और मिशनों द्वारा स्थानीय स्तर पर विविध कार्यक्रम, संवाद सत्र और सांस्कृतिक आयोजन किए जा रहे हैं। ये कार्यक्रम इस बात का प्रमाण हैं कि प्रवासी भारतीय दिवस केवल एक बड़े सम्मेलन तक सीमित नहीं है, यह एक सतत प्रक्रिया है। अगला मुख्य सम्मेलन वर्ष 2027 में प्रस्तावित है, जिससे वैश्विक भारतीय समुदाय को एक बार फिर व्यापक मंच पर एक साथ आने का अवसर मिलेगा।
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में प्रवासी भारतीय दिवस ने नई पहचान और नई दिशा प्राप्त की है। प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही प्रवासी भारतीयों के साथ संवाद और सहयोग को प्राथमिकता दी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह दृष्टिकोण और व्यापक हो गया। उन्होंने प्रवासी भारतीयों को केवल विदेशों में बसे नागरिकों के रूप में न देखते हुए राष्ट्र निर्माण के सक्रिय भागीदार के रूप में देखा। उनके नेतृत्व में यह मंच ज्ञान, निवेश, नवाचार और वैश्विक अनुभव को भारत की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन गया।
मोदी आर्काइव द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा की गई पोस्ट में प्रधानमंत्री मोदी की इसी भूमिका की सराहना की गई है। पोस्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री ने अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में प्रवासी भारतीयों के महत्व पर लगातार जोर दिया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि प्रवासी समुदाय भारत के लिए केवल भावनात्मक शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक और बौद्धिक शक्ति भी है। उद्यमिता, प्रौद्योगिकी, कौशल विकास और सामाजिक पहलों जैसे क्षेत्रों में वैश्विक भारतीय प्रतिभा को भारत से जोड़ने के ठोस प्रयास किए गए हैं। यह जुड़ाव केवल प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि व्यावहारिक परिणामों पर केंद्रित रहा है, जिससे दुनियाभर में बसे भारतीयों को यह विश्वास मिला कि वे भारत के भविष्य को आकार देने में वास्तविक भूमिका निभा सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं एक्स पर लिखा है, “प्रवासी भारतीय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। भारतीय डायस्पोरा भारत और दुनिया के बीच एक मजबूत पुल बना हुआ है। वे जहाँ भी गए, उन्होंने वहाँ के समाजों को समृद्ध किया और साथ ही अपनी जड़ों से भी जुड़े रहे। मैं अक्सर कहता हूँ कि हमारा डायस्पोरा हमारे राष्ट्रदूत हैं, जिन्होंने भारत की संस्कृति को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाया है। हमारी सरकार ने हमारे डायस्पोरा को भारत के और करीब लाने के लिए कई कदम उठाए हैं।”
आज दुनिया भर में लगभग तीन करोड़ भारतीय मूल के लोग विभिन्न देशों में रहते हैं। वे वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, उद्यमी, शिक्षक, कलाकार और नीति निर्माता के रूप में वैश्विक समाज में अपनी पहचान बना चुके हैं। प्रवासी भारतीय दिवस उन्हें यह एहसास कराता है कि उनकी जड़ें भारत में हैं और भारत उनकी उपलब्धियों पर गर्व करता है। यह दिवस साझा संस्कृति और पहचान का उत्सव होने के साथ साथ भारत की विकास प्राथमिकताओं से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, हरित ऊर्जा और सामाजिक नवाचार जैसे क्षेत्रों में प्रवासी भारतीयों का अनुभव और विशेषज्ञता भारत के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। प्रवासी भारतीय दिवस इसी संभावित सहयोग को दिशा देने का कार्य करता है। यह मंच संवाद, साझेदारी और विश्वास को मजबूत करता है, जिससे भारत और उसका प्रवासी समुदाय एक साझा भविष्य की ओर अग्रसर हो सकें।
अंततः इस संदर्भ में कहना यही होगा कि प्रवासी भारतीय दिवस अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाला एक सशक्त सेतु है। महात्मा गांधी की ऐतिहासिक वापसी से प्रेरित यह दिवस आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वैश्विक भारतीय समुदाय को राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन चुका है। चाहे वह नॉन कन्वेंशन वर्ष ही क्यों न हो, प्रवासी भारतीय दिवस की भावना और उद्देश्य निरंतर जीवित रहते हैं। यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसकी भौगोलिक सीमाओं में होने के साथ ही विश्वभर में फैले उन भारतीयों में भी निहित है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर भारत के विकास में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यही प्रवासी भारतीय दिवस की वास्तविक अंतर्निहित चेतना और स्थायी प्रासंगिकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी