पं. विद्यानिवास मिश्रः भारतीय चिंतन धारा के अप्रतिम व्याख्याकार
जन्मशती (14 जनवरी) के अवसर पर विशेष - गिरीश्वर मिश्र भारत के सांस्कृतिक इतिहास की प्रमुख त्रासदी यह थी कि अंग्रेजी उपनिवेश के दौरान भारत को भारत से अपरिचित ही नहीं बनाया गया बल्कि भारतीयों में उसके मूल स्वभाव के प्रति गहरी वितृष्णा भी पैद
पं. विद्यानिवास मिश्र (फोटोः फाइल)


जन्मशती (14 जनवरी) के अवसर पर विशेष

-

गिरीश्वर मिश्र

भारत के सांस्कृतिक इतिहास की प्रमुख त्रासदी यह थी कि अंग्रेजी उपनिवेश के दौरान भारत को भारत से अपरिचित ही नहीं बनाया गया बल्कि भारतीयों में उसके मूल स्वभाव के प्रति गहरी वितृष्णा भी पैदा की गई। स्वयं अपने प्रति घृणा के जो बीज बोए गए और उसे सुदृढ़ करने के लिए जो शिक्षा व्यवस्था रची गई उसके फलस्वरूप भारत की ज्ञान-परम्परा, सांस्कृतिक अभ्यास और जीवन पद्धति आदि संदिग्ध बना दिया गया। इसका परिणाम आत्म-निषेध के रूप में प्रतिफलित हुआ। दूसरी ओर जो पराया और प्रतिकूल था उसे बिना विचारे अंगीकार किया जाता रहा। पाश्चात्य शिक्षा और अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का असर कुछ ऐसा हुआ कि हम घोर अनुकरण के दुश्चक्र में फँस गए। फलत: स्वतंत्र होने के बाद भी मौलिक चिंतन प्रायः अनुपस्थित रहा। मुक्त मन से अपनी स्थिति पर आत्म चेतस भाव से दृष्टिपात करने की इच्छा जाती रही। और तो और भारत की पहचान पश्चिमी दुराग्रहों और आग्रहों के साथ होने लगी।

भारत को भारत की दृष्टि से देखने की संवेदना ज्ञान की मर्यादा के विपरीत थी। फलतः हम पाश्चात्य विचार दृष्टि के खाके में ही भारत को समझने के अभ्यस्त होते गए। मनुष्य, समाज, मूल्य-बोध, प्रकृति, राज्य, व्यवस्था, तथा शिक्षा आदि के प्रश्न पश्चिमी सैद्धांतिक व्यवस्था की परिधि में विचारे जाने लगे और उन्हीं की कसौटी पर जाँचे परखे जाने लगे। इसके फलस्वरूप भारतीय मन में हीनता का भाव भी बढ़ा पर उससे अधिक हानि उस सांस्कृतिक निरक्षरता से हुई जिसे आधुनिकता के लिए एक जरूरी कदम माना गया। ऐसे में देश अजनवी होता गया और स्वतंत्र भारत में विचार का स्वराज प्रस्फुटित ही न हो सका। देश की बौद्धिक परम्परा कलात्मक विरासत, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतन विषयक अवदान से भी हम अनभिज्ञ होते गए। हम उधारी की विचार संपदा के बोझ तले इस तरह दबते गए कि हममें से कई लोग भारत की उस अस्मिता को प्रश्नांकित करने लगे जिसके लिए स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी।

ऐसे परिप्रेक्ष्य में भारतीय चिंतन और विचार-सरणि को सामने रखना और उसे लेकर व्याप्त दुर्व्याख्याओं और भ्रमों का प्रतिकार करना तथा उनको वर्तमान भारतीय और वैश्विक संदर्भ में विवेचित करना अपने आत्म बोध के लिए आवश्यक है। पंडित विद्यानिवास मिश्र उन थोड़े से भारतविदों में थे जिन्होंने इस कार्य को गंभीरता से लिया। बड़े मनोयोग, धैर्य और असाधारण बौद्धिक साहस के साथ यह कार्य किया।

विद्यानिवास मिश्र ने धर्म, लोक, शास्त्र, देश, काल, परम्परा, आधुनिकता जैसे प्रत्ययों को समकालीन चिंतन के प्रसंग में व्याख्यायित किया। उनका रचा साहित्य भारत को समझने और समझाने का एक विशाल उपक्रम सरीखा है। उनके ललित निबन्ध जहाँ भारत की पार्थिव गन्ध से सुवासित हैं वहीं, उनका शास्त्रीय चिंतन यहाँ की सांस्कृतिक चेतना को प्रकट करता है। वह रस की तलाश को जीवन का अभीष्ट मानते थे और उसके लिए संवाद हेतु तत्पर रहते थे। उनके लिए परम्परा वह है जो पर के भी परे यानी श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर हो। वह निरंतर साध्य है । उन्होंने तंत्र, कला, रस, रीति, शब्द, लोक-जीवन आदि से जुड़े अनेक प्रश्नों का समाधान किया और कई नई स्थापनायें कीं। साहित्य का आस्वादन कराते हुए उन्होंने वाल्मीकि, वेद व्यास, भवभूति और कालिदास, मध्यकालीन भक्ति काव्य तथा आधुनिक साहित्य का सांस्कृतिक विमर्श प्रस्तुत किया।

वे संस्कृत के पंडित थे, आस्तिक हिंदू थे, हिंदी के लेखक थे, सैलानी थे, प्राध्यापक थे, आधुनिक साहित्य के अध्येता और भारतीय बोध के प्रखर प्रवक्ता थे। भारत ही नहीं यूरोप, अमेरिका आदि की यात्राओं और अनुभवों ने उनकी दृष्टि और विचार पद्धति को तीक्ष्ण किया था। उनके सांस्कृतिक विवेक ने समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य को समझने में मदद की। अपनी रचनाओं और वक्तृता से मिश्र जी ने सोते हुओं को जगाने, उकसाने और उन्मीलित करने के लिए अथक प्रयास किया। भारतीय संस्कृति की रसमयता और सर्जनात्मकता में मिश्र जी का अगाध विश्वास था और इस प्रतीति को वह सहजता से देखते, गुनते, सहेजते और उन्मुक्त भाव से सब के साथ साझा करते रहे।

भारतीय विश्व दृष्टि की व्याख्या करते हुए मिश्र जी मानते हैं कि मनुष्य सृष्टि का उपभोक्ता नहीं सहयात्री है। मनुष्य और प्रकृति को वे अविलग देखते हैं। उनके शब्दों में ‘बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर बुद्धि का प्रकाश है; बाहर जो अंधकार है, वही भीतर का भय है; बाहर जो तृण विरुध और वृक्ष में ऊपर उठने की प्रक्रिया है, वही भीतर की उमंग है। इसीलिए मनुष्य और देवता में स्पर्धा नहीं है, सहकार भाव है।”

मिश्र जी स्पष्ट रूप से कहते हैं ‘जहाँ पश्चिमी चिंतन मनुष्य को केंद्र में रखता है मनुष्य अप्रतिहत बुद्धि को केंद्र में रखता है, प्रकृति पर मनुष्य की विजय को मनुष्य का पुरुषार्थ मानता है तथा पूरी सृष्टि को मनुष्य का उपभोग्य मानता है, वहाँ भारतीय हिन्दू चिंतन कोई एक केंद्र देखता ही नहीं, उसका विश्व बहु केंद्रीय है, मनुष्य के लिए देवता केंद्र है, देवता के लिए मनुष्य, वहाँ प्रकृति पर विजय नहीं प्रकृति से सामंजस्य और समग्र अस्तित्व में परम सामंजस्य स्थापित करना ही मानव जीवन का लक्ष्य है।’

वे मानते हैं कि विकास वही है जो मनुष्य को अधिक मनुष्य बनावे। वे समस्त भूतों (प्राणियों) के ऋण की परिशुद्धि ही परम पुरुषार्थ मानते हैं। भारत में मनुष्य सृष्टि के केंद्र में न हो कर मनुष्य और सृष्टि के बीच बिंबानुबिंब भाव केंद्र में रहा। मिश्र जी वस्तुओं की परस्परपूरकता और परस्पर अवलंबिता पर बल देते हैं।

आज जिस वैज्ञानिक मनोभाव की अंधभक्ति है वह शक्ति के केंद्रीकरण की और उन्मुख है। इससे अनियोजित और अविवेकपूर्ण औद्योगिक विकास शुरू हुआ। इसने ख़ास तरह की उपभोक्ता संस्कृति को जन्म दिया। मनुष्य तकनीकी पर अवलंबित होने लगा। यह सोच कि सृष्टि मात्र हमारी उपभोग्य है, पूरी दुनिया उपभोग्य है प्रकृति विजेय है, हम विजेता हैं, गलत धारणा है। प्रकृति विमुख विकास विकृति होगा। संस्कृति में उपभोग वृत्ति का बढ़ना परिवर्तन है पर विकृति है। दूसरी तरफ़ परम्परा के भीतर से उन्नयन वास्तविक विकास होगा। अब ‘विकास’ प्रायः प्रौद्योगिक उन्नति और आर्थिक वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

आज की स्थिति को लेकर वह आगाह कराते हुए कहते हैं कि ‘धन-संप्रभुता के बल पर तकनीकी का ज्ञान ख़रीद फरोख्त का विषय हुआ। इस ज्ञान से संपन्न व्यक्ति भी बिकाऊ हुआ और वह मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार तकनीकी रचना के बजाय धन-संप्रभु के द्वारा प्रस्तुत किए गए उत्पाद का महत्वपूर्ण समझने में नियोजित हुआ, जिससे कि माँग बढ़ाई जाये, माँग से अधिक लालच बढ़ाई जाये, वस्तुओं के प्रति आसक्ति बढ़ाई जाये। यह एक ख़तरनाक मोड़ है। इसकी ओर आगाह करना विचारशील मनुष्य का कर्तव्य है।’ मिश्र जी उसे मूल्य विमर्श और मनुष्य, प्रकृति, सृष्टि के प्रसंग में स्थापित करते हैं। वे संस्कृति के स्वस्थ विकास और विकृत आधुनिकता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं।

ध्यातव्य है प्रकृति सिर्फ भौतिक जगत ही नहीं है। संस्कृति को खोकर पाया गया विकास मनुष्य को खो देता है। वे क़हते हैं कि आज का विश्व संवादहीनता की मार से संत्रस्त है। इसलिए अधिक से अधिक वस्तुओं के संग्रह करने की तथा उनकी प्रभुता का मद ढोने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और मनुष्य अकेला होता जा रहा है। उसे अविश्वास, भय और तिरस्कार इतना ग्रस लेते है कि वह मनुष्यता ही खो देता है। मनुष्य का धर्म है जुड़ना, जोड़ना और जोड़ने के व्यापार का विस्तार करना। सृष्टि के साथ सामंजस्य और साझेदारी की भावना स्थापित करना ही मानुष धर्म है। मनुष्य सृष्टि का सिरमौर इसलिए नहीं है कि वह उनके ऊपर शासन के लिए पैदा हुआ है बल्कि इसलिए कि वह उनकी सार्थकता को भी अपने संपर्क से, अपनी करुणा से, अपनी भावना और अपनेपन से पूर्ण सार्थकता दे सकता है। आज के वैश्विक संदर्भ में इस प्रकार की सोच आशा का संचार करती है।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश