विचारों का संघर्ष और आहत होती आत्मा
दीपक कुमार द्विवेदी आज का समय सामान्य नहीं है। यह ऐसा काल है जब युद्ध धरती पर नहीं, बल्कि मानव-चेतना के भीतर चल रहा है। यह शस्त्रों का संघर्ष नहीं, विचारों का संघर्ष है। इसमें रक्त भले न बहे, पर समाज की आत्मा अवश्य आहत होती है। बाहर कोई शोर नहीं
दीपक कुमार द्व‍िवेदी


दीपक कुमार द्विवेदी

आज का समय सामान्य नहीं है। यह ऐसा काल है जब युद्ध धरती पर नहीं, बल्कि मानव-चेतना के भीतर चल रहा है। यह शस्त्रों का संघर्ष नहीं, विचारों का संघर्ष है। इसमें रक्त भले न बहे, पर समाज की आत्मा अवश्य आहत होती है। बाहर कोई शोर नहीं उठता, लेकिन भीतर की चुप्पी में विभाजन की प्रतिध्वनि लगातार गहराती जाती है। यह लड़ाई किसी बाहरी शत्रु के विरुद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से, समाज को समाज से और व्यक्ति को स्वयं से अलग करने की सुविचारित प्रक्रिया है, जिसे वामपंथी मानसिकता और उसके सांस्कृतिक रूप के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है। वामपंथी रणनीति का मूल सिद्धांत संघर्ष है। व्यक्ति को उसकी पहचान के आधार पर बांट दो और फिर उन खांचों में शत्रुता का बीज बो दो। जब मनुष्य अपने को अलग समझने लगता है, तब समुदाय की शक्ति टूटने लगती है। समुदाय के कमजोर पड़ते ही समाज की संरचना डगमगाने लगती है और जब समाज कमजोर होता है तब संस्कृति धीरे-धीरे ढहने लगती है। यही कारण है कि यह वैचारिक युद्ध सबसे पहले धर्म, संस्कृति, परिवार, उत्सव, आश्रम, गुरुकुल और परंपरागत सामाजिक संस्थाओं को निशाना बनाता है।

पहले इनका उपहास किया जाता है, फिर उनकी उपयोगिता पर प्रश्न उठाए जाते हैं और अंत में इनके विपरीत मूल्यों का महिमामंडन किया जाता है। जब मनुष्य अपनी जड़ों पर संदेह करने लगता है, तभी उसकी पहचान सबसे अधिक कमजोर हो जाती है। इसी प्रक्रिया से एक अत्यंत खतरनाक वैचारिक औजार उभरा, जिसे द्विआधारी सिद्धांत कहा जाता है। इसका उद्देश्य हर स्थान पर दो विरोधी खेमे खड़े करना है। राम और रावण, दुर्गा और महिषासुर, ब्राह्मण और अब्राह्मण, संपन्न और विपन्न, पुरुष और स्त्री, मालिक और मज़दूर। जब समाज स्वयं को दो टकराते धड़ों में देखने लगता है, तब संवाद समाप्त होता है और संघर्ष प्रारम्भ होता है। यही संघर्ष सत्ता-चिंतन के लिए सबसे प्रभावी औजार बन जाता है। पहचान-राजनीति इसी मानसिकता का विस्तार है। पश्चिम में इसका रूप नस्ली आलोचनात्मक सिद्धांत के रूप में प्रकट हुआ, जिसने कहा कि श्वेत जन्म से शोषक और अश्वेत जन्म से शोषित।

भारत में इसी विचार को जाति-नस्ल सिद्धांत के रूप में लागू करने का प्रयास हुआ। इसमें प्रचारित किया गया कि ब्राह्मण जन्म से अपराधी और दलित, पिछड़ा, आदिवासी जन्म से पीड़ित। जबकि भारत का इतिहास बताता है कि जाति-आधारित कठोरता कुछ सीमित उदाहरणों का परिणाम थी, न कि संपूर्ण समाज का स्वभाव। किंतु विचारधारा ने कुछ अपवादों को ही सम्पूर्ण समाज का स्थायी चेहरा घोषित कर दिया और संवाद के स्थान पर प्रतिशोध को महत्व देने लगा। दुख को मिटाने के बजाय दुख को पहचान और राजनीति का आधार बना देना अत्यंत घातक परिवर्तन था। जब जाति का आख्यान कमजोर पड़ने लगा, तब संघर्ष के लिए नया क्षेत्र तैयार किया गया, जिसे लिंग-युद्ध का नाम दिया गया। प्रकृति में तीन प्रकार के लिंग हैं पुरुष, स्त्री और उभयलिंगी। लेकिन विचारधारा ने घोषित किया कि लिंग कोई जैविक सत्य नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक निर्माण है। देखते-देखते विश्व में सैकड़ों नई लिंग-पहचानें गढ़ दी गईं, जिनसे युवा पीढ़ी अपनी ही प्रकृति को लेकर भ्रमग्रस्त होने लगी। पहचान, जो कभी शक्ति का स्रोत होती थी, अब असमंजस का कारण बन गई। युवा पीढ़ी स्वयं से पूछने लगी कि मैं कौन हूँ, लेकिन उत्तर धुंधला होता गया।

यही असमंजस आगे बढ़कर पहचान-संकट का रूप ले चुका है। इसी संकट को गहरा करने के लिए एक और हथियार सामने आया, जिसे पीड़ित-दावा राजनीति कहा जा सकता है। इस विचार में कहा गया कि जो स्वयं को अधिक पीड़ित घोषित करे वही नैतिक श्रेष्ठता का अधिकारी है। जिस समूह के दुख का इतिहास अधिक प्रखर दिखाया जाए, उसी को समाज में नैतिक ऊँचाई दी जाए। परिणामस्वरूप संघर्ष न्याय का नहीं रहा, बल्कि प्रतिस्पर्धी पीड़ाओं का युद्ध बन गया। अब मनुष्य मनुष्य से नहीं लड़ रहा, बल्कि एक पीड़ा दूसरी पीड़ा से लड़ रही है। और जब पीड़ा ही पहचान बन जाए, तब समाधान कोई नहीं चाहता क्योंकि समाधान से राजनीति समाप्त हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के पीछे वैश्विक आर्थिक शक्तियों का हित भी निहित है। टूटे हुए मनुष्य से बड़ा उपभोक्ता कोई नहीं। लिंग-भ्रम, मानसिक असुरक्षा, अकेलापन, पहचान-संकट ये सब अब बहु-अरब की अर्थव्यवस्था का स्वरूप ले चुके हैं। हार्मोन उपचार, लिंग-परिवर्तन शल्यक्रिया, मनो-परामर्श, पहचान आधारित वस्तुएँ, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की समावेशन योजनाएँ, अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन इन सबका लाभ तभी है जब समाज स्थायी रूप से विभाजित रहे। इसीलिए विश्व की आर्थिक शक्तियाँ इस संघर्ष को पोषित करती हैं और इसे संसाधन के रूप में उपयोग में लाती हैं। लेकिन यह केवल विचारों का संघर्ष नहीं है।

यह मानवता के अस्तित्व का प्रश्न है। जब परिवार टूटता है तब समाज टूटता है। जब समाज टूटता है तब राष्ट्र क्षीण हो जाता है। और जब राष्ट्र कमजोर होता है तब मानवता अपने आधार से वंचित रह जाती है। मनुष्य जब अपनी पहचान, संस्कृति, परिवार और जिम्मेदारी से दूर हो जाता है, तब वह एक रिक्त खोल बनकर रह जाता है। और रिक्त खोल सभ्यता नहीं बनाते, वे अराजकता को जन्म देते हैं। आज प्रश्न यह है कि क्या आने वाली पीढ़ी भ्रम में जन्म लेगी। क्या बच्चे यह पहचान नहीं पाएंगे कि वे कौन हैं। क्या परिवार और समाज केवल इतिहास की पुस्तकों में बचेंगे। क्या मनुष्य अकेला, भयग्रस्त और दिशाहीन प्राणी बन जाएगा। या हम यह समझने के लिए उठ खड़े होंगे कि यह संघर्ष किसी जाति, धर्म, वर्ग या लिंग का नहीं, बल्कि मानवता की रक्षा का संघर्ष है। समय की मांग है कि हम संघर्ष की भाषा छोड़कर समरसता और संवाद की ओर लौटें। सत्य की ओर लौटें। क्योंकि मनुष्य विभाजन से नहीं, एकता से आगे बढ़ता है। संघर्ष से नहीं, सह-अस्तित्व से खिलता है। यह विचारों का युद्ध है और इसकी विजय भी विचारों से ही होगी। और वह विचार यही है कि मनुष्य मनुष्य का विरोधी नहीं, मनुष्य मनुष्य का सहचर है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी