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आतंक के पर्याय हिडमा का हुआ अंत, सुरक्षा बल गदगदगढ़चिरौली, 18 नवंबर (हि.स.)। कुख्यात नक्सली नेता माड़वी हिडमा ने फिलीपींस में जाकर गुरिल्ला युद्ध सीखा था। माओवादी संगठन के केंद्रीय कमेटी के सदस्य और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की बटालियन-1 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला कुख्यात नक्सली माड़वी हिडमा आतंक का पर्याय था। वह अपनी रणनीतिक क्षमता और नेतृत्व के कारण स्थानीय समुदायों में माओवादी विचारधारा फैलाने के लिए उसे स्कूल भी स्थापित किए थे।
सुरक्षा बलों ने मंगलवार सुबह आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू जिले के मारेदुमिल्ली के पास हुई एक मुठभेड़ में कुख्यात नक्सली नेता माड़वी हिडमा औरउसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का और पांच अन्य नक्सलियों को मार गिराया गया। यह मुठभेड़ में स्थल छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश सीमा के नजदीक स्थित है। इस मुठभेड़ मे मारा गया नक्सली कमांडर हिडमा ने फिलीपीन्स जा कर गुरिल्ला युद्ध सीखा था। हिडमा के खात्मे से नक्सल आंदोलन अब लगभग धराशायी हो गया है। सुरक्षा बल जहां इस कुख्यात नक्सली नेता के मारे जाने से गदगद है वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस कामयाबी पर सुरक्षा बलों को बधाई दी है।
हिडमा, जिसे मडावी, संतोष और इंदमुल के नामों से भी जाना जाता था। पिछले दो दशकों से छत्तीासगढ़ के बस्तर में नक्सल आतंक का पर्याय बना हुआ था। वह भारतीय माओवादी संगठन के केंद्रीय कमेटी का सदस्य था और बस्तर के नक्सल गढ़ों में आतंक फैलाने में शामिल था। हिडमा के नेतृत्व में नक्सलियों ने कई बड़े हमलों को अंजाम दिया था। इनमें 2010 में दंतेवाड़ा हमला (जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे), 2013 में झीरम घाटी नरसंहार (जिसमें कांग्रेस के कई शीर्ष नेता समेत 31 लोग मारे गए थे) और 2017 में बुरकापाल हमला (जिसमें 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे) शामिल हैं।
हिडमा का आतंक-
हिडमा का जन्म 1981 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के एक आदिवासी गांव पुवारती में हुआ था। वह मुरिया जनजाति से था और 1996 में 16 साल की उम्र में माओवादी आंदोलन से जुड़ा। अपनी कम उम्र में ही उसने माओवादी संगठन के केंद्रीय कमेटी में सदस्यता प्राप्त की और जल्द ही पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की बटालियन-1 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी रणनीतिक क्षमता और नेतृत्व के कारण, हिडमा ने स्थानीय समुदायों में माओवादी विचारधारा फैलाने के लिए क्रांतिकारी स्कूल भी स्थापित किए।
फिलीपींस में लिया था गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण-
हिडमा की सैन्य रणनीति और हमलों की योजना में एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उसने फिलीपींस में गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग ली थी। यह प्रशिक्षण उसे न केवल स्थानीय इलाके में घातक हमला करने की क्षमता प्रदान करता था, बल्कि उसे जंगलों और दुर्गम इलाकों में सुरक्षित रूप से छिपने और हमला करने की विशेषज्ञता भी मिली थी। इस प्रशिक्षण ने उसे बस्तर में नक्सल गतिविधियों के संचालन में बहुत सक्षम बनाया।
कुख्यात हमलों की सूची-
1. 2010 दंतेवाड़ा हमला: हिडमा के नेतृत्व में हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे।2. 2013 झीरम घाटी नरसंहार: इस हमले में कांग्रेस के शीर्ष नेता सहित 31 लोग मारे गए थे।
3. 2017 बुरकापाल हमला: 25 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे।
हिडमा का नाम इन घटनाओं के अलावा कई अन्य हमलों से भी जुड़ा है, जिनमें सुरक्षा बलों के जवान और आम नागरिक भी मारे गए थे। उसकी रणनीति और माओवादी विचारधारा फैलाने का तरीका इतना प्रभावी था कि उसे बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में नक्सलियों का 'बिग बॉस' माना जाता था।
सुरक्षा बलों की सफलता-
इस मुठभेड़ को लेकर सुरक्षा बलों ने कहा कि यह नक्सलवाद के खिलाफ एक महत्वपूर्ण जीत है। छत्तीसगढ़ पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम ने बस्तर के दुर्गम इलाकों में प्रवेश कर हिडमा और उसके साथियों का सफाया किया। यह ऑपरेशन भारतीय सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि हिडमा पिछले कई वर्षों से माओवादी नेटवर्क का प्रमुख चेहरा था।
आगे का रास्ता-
विशेषज्ञों का मानना है कि हिडमा की मौत से नक्सलवादी गतिविधियों में एक बड़ी कमी आएगी, लेकिन यह केवल एक शुरुआत है। छत्तीसगढ़ और अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में माओवादी हिंसा का अंत तभी संभव है जब संगठन के अन्य कुख्यात नेताओं को भी समाप्त किया जाए। भारतीय सरकार और सुरक्षा बल इस जीत को एक नए चरण की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं, जिसमें नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
इस महत्वपूर्ण सफलता पर देशभर में सुरक्षा बलों के योगदान की सराहना की जा रही है, और उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में भी इसी तरह के ऑपरेशनों से नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक प्रहार किए जाएंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी