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जयपुर, 15 नवंबर (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुडे मामले में कहा है कि विवाहित या वयस्क संतान का उसके पिता की स्वअर्जित संपत्ति में कोई हक नहीं है। पिता की निजी संपत्ति में बेटा उनकी मंजूरी से ही रह सकता है और पिता के कहने पर उसे संपत्ति को खाली करना होगा। अदालत ने कहा कि बेटे को संपत्ति पर कब्जा पिता ने स्नेहवश दिया था, यह किसी कानूनी अधिकार के तौर पर नहीं दिया गया। वहीं अदालत ने निचली कोर्ट व अपीलीय कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पिता के खिलाफ मुकदमा कर उन्हें परेशान करने वाले बेटे पर एक लाख रुपए का हर्जाना लगाया है। इसके साथ ही अदालत ने अपील को भी खारिज कर दिया है। जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने यह आदेश रितेश खत्री की अपील पर दिए।
अदालत ने कहा कि अपीलार्थी पर लगाई गई हर्जाना राशि एक पिता के इस मुकदमे को लड़ने में झेेली गई पीड़ा व उत्पीड़न की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। लेकिन यह भविष्य के लिए एक उदाहरण साबित होगा, ताकि इस तरह के मुकदमों को दुर्भावनापूर्ण तरीके से आगे जारी नहीं रखा जाए। अदालत ने कहा कि ऐसा मुकदमा पिता-पुत्र के पवित्र रिश्ते पर कलंक है और समाज के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने निचली कोर्ट के आदेशों और रिकॉर्ड से पाया कि मकान पिता ने अपने निजी धन से खरीदा था, वह संयुक्त परिवार का हिस्सा नहीं रहा। ऐसे में संपत्ति पर बेटे का कब्जा केवल पिता की मंजूरी पर आधारित था और इसे कोई कानूनी मान्यता प्राप्त अधिकार नहीं मान सकते। अदालत ने कहा कि बचपन से किसी संपत्ति में रहना या वयस्क होने पर पिता द्वारा उसे रहने की अनुमति देना, कानूनी स्वामित्व नहीं बनाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक