बस्तर दशहरा की पहली रस्म 'पाटजात्रा' पूजा विधान 12 अगस्त को, बिलाेरी से पहुंची पहली लकड़ी
जगदलपुर, 10 अगस्त (हि.स.)। बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर माने जाने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महापर्व की पहली रस्म ''पाटजात्रा'' पूजा विधान के लिए ग्राम बिलोरी के ग्रामीण साेमवार को जंगल से साल लकड़ी का विशेष गोला लेकर जगदलपुर पहुंचे। प
पाटजात्रा' पूजा विधान 12 अगस्त को, बिलाेरी से पंहुची पहली लकड़ी.jpg


जगदलपुर, 10 अगस्त (हि.स.)। बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर माने जाने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महापर्व की पहली रस्म 'पाटजात्रा' पूजा विधान के लिए ग्राम बिलोरी के ग्रामीण साेमवार को जंगल से साल लकड़ी का विशेष गोला लेकर जगदलपुर पहुंचे।

पिछले दस वर्षों से यह लकड़ी ट्रैक्टर के माध्यम से लाई जा रही थी, लेकिन इस बार ग्रामीणों ने पुरानी परंपरा का पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन करते हुए बैलगाड़ी से खींचते हुए पूरे सात किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर जगदलपुर मां दंतेश्वरी मंदिर के सिंह द्वार के सामने स्थापित किया गया । आगामी 12 अगस्त को मां दंतेश्वरी मंदिर के सिंह द्वार के सामने स्थापित रथ निर्माण की पहली लकड़ी की पूजा परंपरानुसार रथ निर्माण के औजारों

के साथ किया जायेगा। इसके साथ ही 75 दिवसीय बस्तर दशहरा महापर्व का औपचारिक शुभारंभ हो जाएगा। इस पहली लकड़ी से रथ निर्माण के लिए बनाये जाने वाले औजार टुरलू खोटला अर्थात विशालकाय हथौड़ा बनाया जायेगा।

बस्तर दशहरा महापर्व में 'पाटजात्रा' पूजा विधान के लिए दुमंजिला रथ निर्माण की पहली लकड़ी लाने की जिम्मेदारी परंपरानुसार ग्राम बिलोरी के ग्रामीणाें काे प्राप्त है। ग्राम बिलोरी के संपत पुजारी ने बताया कि लगभग छह फीट लंबी और तीन फीट परिधि वाली इस लकड़ी को स्थानीय बाेली में 'ठुरलु खोटला' कहा जाता है, जिसकी विधिवत पूजा-अर्चना के साथ ही बस्तर दशहरा महापर्व की शुरुआत होती है। ग्राम बिलोरी के पटेल पुनऊराम ने बताया कि इस बार सभी ग्रामीणों ने मिलकर यह संकल्प लिया था कि वे ट्रैक्टर के बजाय बैलगाड़ी में ही ठुरलु खोटला लेकर मां दंतेश्वरी की सेवा में समर्पित करेंगे।

दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी से मिली जानकारी के अनुसार 75 दिवसीय बस्तर दशहरा महापर्व का आयोजन तय कार्यक्रम के अनुसार, 12 अगस्त: पाट जात्रा पूजा विधान, 24 सितंबर: डेरी गड़ाई पूजा विधान, 10 अक्टूबर: काछनगादी पूजा विधान, 11 अक्टूबर: कलश स्थापना पूजा विधान, 12 अक्टूबर: जोगी बैठाई पूजा विधान, 13 से 18 अक्टूबर: नवरात्रि पूजा एवं रथ परिक्रमा पूजा, 18 अक्टूबर: बेल पूजा / फूल रथ परिक्रमा, 19 अक्टूबर: महाअष्टमी पूजा, निशा जात्रा पूजा, 20 अक्टूबर: कुंवारी पूजा, जोगी उठाई, मावली परघाव, 21 अक्टूबर: भीतर रैनी पूजा, रथ परिक्रमा, 22 अक्टूबर: कुम्हड़कोट पूजा, रथ यात्रा पूजा, 23 अक्टूबर: काछन जात्रा, मुरिया दरबार, 24 अक्टूबर: कुटुंब जात्रा, गंगामुंडा पूजा, विदाई पूजा, 27 अक्टूबर: मां दंतेश्वरी, दंतेवाड़ा की विदाई पूजा के साथ बस्तर दशहरा महापर्व का आगामी वर्ष के लिए परायण हाेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे