Enter your Email Address to subscribe to our newsletters


राजर्षि टंडन स्मृति व्याख्यानमाला में कृत्रिम मेधा और भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ मंथन
प्रयागराज, 01 अगस्त (हि.स.)। भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (एजीआई) से होगी। यह बातें शनिवार को उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित 19वीं राजर्षि टंडन स्मृति व्याख्यानमाला में बतौर मुख्य वक्ता देश के प्रसिद्ध तकनीकी विशेषज्ञ एवं साहित्यकार बालेंदु शर्मा दाधीच ने कहीं।
उन्होंने कहा कि तकनीक का विकास तभी मानवता के लिए उपयोगी होगा, जब उसे नैतिक मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ जोड़ा जाएगा।
बालेंदु शर्मा दाधीच ने कहा कि वर्तमान एआई मनुष्य के निर्देशों पर काम करने वाला एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन जब एजीआई स्वयं सोचने, निर्णय लेने और सीखने में सक्षम हो जाएगी, तब उसके सामाजिक और नैतिक प्रभाव अधिक गंभीर होंगे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के मस्तिष्क में संवेदना, करुणा और नैतिकता होती है, जबकि कंप्यूटर केवल आंकड़ों और एल्गोरिद्म के आधार पर कार्य करता है। इसलिए नई पीढ़ी को तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय मूल्यों और रचनात्मक सोच को भी अपनाना होगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा जीवन को संतुलित और मूल्यनिष्ठ बनाने का मार्ग दिखाती है। यदि आधुनिक तकनीक का विकास भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के साथ किया जाए तो कृत्रिम मेधा मानव कल्याण और राष्ट्र निर्माण का प्रभावी माध्यम बन सकती है। उन्होंने युवाओं से तकनीक के केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके सृजनकर्ता और जिम्मेदार उपयोगकर्ता बनने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. सत्यकाम ने कहा कि पाठ्यक्रमों में कृत्रिम मेधा का समावेश अब समय की आवश्यकता बन चुका है। कृत्रिम मेधा से डरने के बजाय उसे समझना और उसका विवेकपूर्ण उपयोग करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में एआई को शामिल करना अब समय की मांग है। साथ ही शिक्षकों की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि मूल्यपरक शिक्षा और तकनीक के नैतिक उपयोग की प्रेरणा देना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने युवाओं से भारतीय ज्ञान परंपरा, ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन करने का भी आह्वान किया तथा सभी को नशामुक्त भारत के निर्माण का संकल्प दिलाया।
विशिष्ट वक्ता एवं उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने कहा कि कृत्रिम मेधा का उपयोग जनसुविधाओं, सुशासन, पारदर्शिता और सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर बनाने में किया जाना चाहिए। वहीं पूर्व डीआईजी कृपा शंकर सिंह ने कहा कि एआई अनुसंधान, नवाचार और ज्ञान-विस्तार का प्रभावी माध्यम है तथा युवाओं को इसका उपयोग सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए करना चाहिए।
उक्त जानकारी देते हुए विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. प्रभात चन्द्र मिश्र ने बताया कि अटल प्रेक्षागृह में भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की 144वीं जयंती पर आयोजित व्याख्यानमाला का विषय कृत्रिम मेधा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा था। कार्यक्रम में शिक्षा, तकनीक और भारतीय संस्कृति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम के समन्वयक प्रो. पी.के. पाण्डेय ने विषय-प्रस्तावना प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत प्रो. मीरा पाल ने किया तथा प्रो. आनन्दा नंद त्रिपाठीने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. त्रिविक्रम तिवारी ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के निदेशक, आचार्य, अधिकारी, कर्मचारी, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में शिक्षाविद और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / रामबहादुर पाल