मऊ : मोहम्मदाबाद गोहना सीट पर बसपा के प्रभारी प्रत्याशी जे.के. आजाद के ऐलान के बाद कार्यकर्ताओं में विरोध, पुलिस ने स्थिति संभाली
मऊ, 06 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मऊ जिले की मोहम्मदाबाद गोहना (सुरक्षित) सीट पर बहुजन समाज पार्टी का एक फैसला चर्चा का विषय बन गया । पार्टी ने नए प्रभारी प्रत्याशी की घोषणा की, लेकिन इसके तुरंत बाद कार्
मंच की फ़ोटो


मऊ, 06 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच मऊ जिले की मोहम्मदाबाद गोहना (सुरक्षित) सीट पर बहुजन समाज पार्टी का एक फैसला चर्चा का विषय बन गया । पार्टी ने नए प्रभारी प्रत्याशी की घोषणा की, लेकिन इसके तुरंत बाद कार्यक्रम में मौजूद कई स्थानीय कार्यकर्ताओं ने खुलकर नाराजगी जताई। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ टिकट को लेकर असंतोष है या फिर संगठन के भीतर गहराते मतभेदों का संकेत?

मऊ में आयोजित बसपा के कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान जैसे ही पार्टी नेतृत्व ने मोहम्मदाबाद गोहना सीट से जे.के. आजाद को प्रभारी प्रत्याशी घोषित किया, कार्यक्रम का माहौल अचानक बदल गया। कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने फैसले का विरोध करते हुए नारेबाजी शुरू कर दी और स्थानीय चेहरे को प्राथमिकता देने की मांग उठाई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मौके पर मौजूद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना था कि वर्षों से क्षेत्र में सक्रिय नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर बाहरी चेहरे को जिम्मेदारी देना उचित नहीं है। उनका दावा था कि स्थानीय उम्मीदवार ही क्षेत्र की समस्याओं और जनता की अपेक्षाओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है।

दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व ने इस विरोध को ज्यादा महत्व नहीं दिया। बसपा के वरिष्ठ पदाधिकारी ने स्पष्ट किया कि किसी भी योग्य व्यक्ति को राज्य की किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य राजनीतिक दलों में भी अलग-अलग जिलों के नेताओं को विभिन्न सीटों से चुनाव लड़ाया जाता रहा है, इसलिए इसे मुद्दा बनाना उचित नहीं है।

नवनियुक्त प्रभारी प्रत्याशी जे.के. आजाद ने भी कार्यकर्ताओं से संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व का निर्णय सर्वोपरि है और सभी कार्यकर्ता मिलकर चुनावी तैयारियों में जुटेंगे। साथ ही उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में बसपा संगठन पहले से अधिक मजबूती के साथ जनता के बीच पहुंचेगा।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रत्याशी की घोषणा के तुरंत बाद सामने आया विरोध पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। यदि स्थानीय स्तर पर असंतोष को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो इसका असर आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति और संगठनात्मक एकजुटता पर पड़ सकता है।

फिलहाल बसपा नेतृत्व अपने फैसले पर कायम है, जबकि कुछ स्थानीय कार्यकर्ता अपनी मांग पर अड़े दिखाई दे रहे हैं। अब देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में पार्टी इस नाराजगी को किस तरह संभालती है और क्या सभी नेता-कार्यकर्ता एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरते हैं या यह विवाद आगे भी राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना रहता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / वेद नारायण मिश्र