समान नागरिक संहिता : संविधान के अधूरे संकल्प से सामाजिक समरसता की ओर
कृष्णमोहन झा भारत का संविधान केवल शासन संचालन का दस्तावेज नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी घोषणापत्र है। संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी, जहाँ नागरिकों के अधिकार उनके धर्म, जाति या पंथ से नहीं, बल्कि उनकी नागरिकता से निर्
कृष्णमोहन झा


कृष्णमोहन झा

भारत का संविधान केवल शासन संचालन का दस्तावेज नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी घोषणापत्र है। संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी, जहाँ नागरिकों के अधिकार उनके धर्म, जाति या पंथ से नहीं, बल्कि उनकी नागरिकता से निर्धारित हों। इसी सोच का प्रतिबिंब संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 44 में दिखाई देता है, जिसमें राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा। स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद मध्यप्रदेश इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ा रहा है। राज्य मंत्रिमंडल द्वारा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को स्वीकृति दिए जाने और उसे विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने के साथ यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है।

समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है। संविधान सभा में इस विषय पर व्यापक चर्चा हुई थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर का मत था कि आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र में नागरिक अधिकारों का आधार समानता होना चाहिए। वहीं के.एम. मुंशी और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर जैसे सदस्यों ने भी नागरिक जीवन से जुड़े मामलों में समान कानूनी व्यवस्था का समर्थन किया। हालांकि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों और देश की विविधता को देखते हुए इसे मौलिक अधिकारों में शामिल करने के बजाय नीति-निर्देशक तत्वों में रखा गया, ताकि समय के साथ सामाजिक सहमति बनने पर इसे लागू किया जा सके।

पिछले सात दशकों में यह विषय समय-समय पर न्यायपालिका, विधि आयोग, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच चर्चा का विषय रहा। शाह बानो प्रकरण, सरला मुद्गल जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह टिप्पणी की कि समान नागरिक संहिता पर गंभीर विचार होना चाहिए। इन टिप्पणियों का उद्देश्य किसी धर्म विशेष पर प्रश्न उठाना नहीं था, बल्कि संविधान में निहित समानता के सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित करना था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी स्वतंत्रता के बाद से समान नागरिक संहिता का निरंतर समर्थन किया है। संघ का मानना रहा है कि व्यक्तिगत कानूनों में समानता राष्ट्रीय एकात्मता और समान नागरिक अधिकारों को मजबूत करेगी। दूसरी ओर अनेक धार्मिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि किसी भी परिवर्तन को व्यापक संवाद, विश्वास और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाना चाहिए। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि बड़े सुधार केवल कानून बनाकर नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से स्थायी रूप से स्थापित होते हैं।

उत्तराखंड द्वारा समान नागरिक संहिता लागू करने के बाद अब मध्यप्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्य सरकार ने पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित की, व्यापक जनसुझाव आमंत्रित किए और उसके आधार पर विधेयक का प्रारूप तैयार किया। सरकार का कहना है कि लाखों सुझाव प्राप्त हुए तथा व्यापक स्तर पर परामर्श के बाद यह मसौदा तैयार किया गया।

प्रस्तावित प्रावधानों में बहुविवाह पर रोक, विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, तलाक की विधिक प्रक्रिया, महिलाओं और पुरुषों के लिए समान उत्तराधिकार अधिकार तथा कुछ परिस्थितियों में लिव-इन संबंधों के पंजीकरण जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। अनुसूचित जनजातियों को फिलहाल इसके दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार का तर्क है कि इसका उद्देश्य नागरिक अधिकारों में समानता स्थापित करना है, जबकि आलोचकों का मानना है कि इसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर भी गंभीर चर्चा आवश्यक है। यहीं इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है क्या केवल कानून बना देने से समानता स्थापित हो जाएगी?

इतिहास बताता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल विधायी निर्णयों से नहीं आते। बाल विवाह निषेध कानून, दहेज निषेध कानून, शिक्षा का अधिकार या घरेलू हिंसा विरोधी कानून—इन सभी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन भी आवश्यक था। समान नागरिक संहिता के साथ भी यही सत्य लागू होगा।

यदि यह कानून महिलाओं को अधिक सुरक्षा देता है, विवाह और उत्तराधिकार में समान अधिकार सुनिश्चित करता है, कानूनी प्रक्रियाओं को सरल बनाता है और नागरिकों को समान न्याय दिलाने में सहायक होता है, तो निस्संदेह यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। लेकिन यदि इसके क्रियान्वयन में संवाद, संवेदनशीलता और विश्वास का अभाव रहा, तो अनावश्यक विवाद भी उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए इस कानून की सफलता उसकी धाराओं से अधिक उसके कार्यान्वयन और सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर करेगी।

मध्यप्रदेश की पहल का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह बहस केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगी। अन्य राज्य भी इस अनुभव का अध्ययन करेंगे। यदि यह मॉडल न्यायपूर्ण, पारदर्शी और प्रभावी सिद्ध होता है, तो यह देशव्यापी विमर्श को नई दिशा दे सकता है। यदि इसमें व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आती हैं, तो उनसे भी सीख लेकर आगे की नीति को बेहतर बनाया जा सकेगा। लोकतंत्र की यही शक्ति है कि वह प्रयोगों से सीखता है।

भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। भाषा, संस्कृति, परंपरा और आस्था की इस विविधता को सुरक्षित रखते हुए समान नागरिक अधिकार सुनिश्चित करना आसान कार्य नहीं है। यही कारण है कि समान नागरिक संहिता पर चर्चा केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि संवैधानिक, सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी होनी चाहिए। इस विषय पर मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेदों के बीच संवाद बना रहना लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

अंततः समान नागरिक संहिता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि क्या यह संविधान की मूल भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को और अधिक मजबूत करती है। यदि यह कानून नागरिकों को समान अधिकार देने के साथ सामाजिक विश्वास भी अर्जित करता है, तो मध्यप्रदेश की यह पहल केवल एक राज्य का विधायी निर्णय नहीं रहेगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद की जाएगी।

संविधान हमें केवल अधिकार नहीं देता, वह एक दिशा भी देता है। समान नागरिक संहिता उसी दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। अब यह समय बताएगा कि यह कदम भारतीय समाज को अधिक न्यायपूर्ण, अधिक समतामूलक और अधिक समरस बनाने में कितना सफल होता है।

(लेखक, राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी