संसद मार्च : सीजेपी की अराजकता, ये भारत के युवा नहीं हो सकते ?
डॉ. मयंक चतुर्वेदी दिल्ली में संसद मार्च के दौरान सामने आए दृश्य आज प्रत्येक देशभक्त भारतवासी को चिंता में डाल रहे हैं। जिसने भी इन्हें देखा, प्रतिक्रिया एक ही सामने आ रही थी, ये अराजकता भारत के युवा चरित्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि लोकता
मयंक चतुर्वेदी


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली में संसद मार्च के दौरान सामने आए दृश्य आज प्रत्येक देशभक्त भारतवासी को चिंता में डाल रहे हैं। जिसने भी इन्हें देखा, प्रतिक्रिया एक ही सामने आ रही थी, ये अराजकता भारत के युवा चरित्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर बैरिकेड तोड़े जाएं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाए, पुलिस पर पथराव हो, संसद तक बलपूर्वक पहुंचने का प्रयास किया जाए और सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषणों तथा अपुष्ट सूचनाओं के माध्यम से वातावरण को और उग्र बनाया जाए, तब स्वाभाविक रूप से यही कहा जाएगा कि क्या यही वह युवा है, जिसकी कल्पना स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे भारत के महान देशभक्तों ने की थी?

स्वामी विवेकानन्द ने भारत के युवाओं के लिए ऊर्जावान के साथ चरित्रवान होने का स्वप्न देखा था। उनका प्रसिद्ध कथन है, हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके। उन्होंने युवाओं से उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए का आह्वान अवश्य किया, किंतु कहीं भी यह नहीं कहा कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए कानून तोड़ो, हिंसा करो या समाज में अराजकता फैलाओ। विवेकानन्द के लिए युवा वह था, जो अपने आत्मबल, संयम और राष्ट्रभक्ति से समाज का नेतृत्व करे।

महर्षि अरविन्द भी भारत के युवाओं को राष्ट्र की आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति मानते हैं। उनका विश्वास है कि भारत का पुनर्जागरण राजनीतिक के स्थान पर चरित्रवान युवाओं से होगा, क्योंकि राष्ट्र निर्माण का आधार आत्मानुशासन है। यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जितने भी महान युवा सामने आए, उन्होंने संघर्ष अवश्य किया, परंतु राष्ट्र की संपत्ति को नष्ट करना, समाज में भय का वातावरण बनाना अथवा भीड़ के उन्माद को नेतृत्व मानना कभी स्वीकार नहीं किया।

यहां महात्मा गांधी के विचारों को भी समझना उपर्युक्त होगा, वे कहते हैं, अहिंसा निर्बलों का नहीं, वीरों का अस्त्र है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मौलिक है, किंतु हिंसा किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को समाप्त कर देती है। यदि किसी आंदोलन का परिणाम आम नागरिकों की पीड़ा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति और कानून-व्यवस्था का संकट बन जाए, तो वह जनांदोलन कैसे कहला सकता है? वह तो लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तोड़ने का कार्य है। विरोध और विध्वंस में यही मूल अंतर है, जिसे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को अपने प्रदर्शन के दौरान समझना चाहिए था।

क्या आज हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर सकते हैं कि भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यही युवा भारत की सबसे बड़ी शक्ति है, किंतु यदि यह शक्ति राष्ट्र निर्माण के स्थान पर अराजकता की दिशा में मुड़ जाए, तब फिर क्या कहा जाएगा, सच पूछिए तो यही स्थिति एक सफल देश के लिए उसकी सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती है, जैसा कि दृश्य दिल्ली में दिखा है।

संसद मार्च के दौरान जो घटनाएं सामने आईं, वस्तुत: उनमें प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, यातायात का ठप हो जाना तथा सोशल मीडिया पर उग्र और विवादित वीडियो का प्रसार, इन सबने लोकतांत्रिक विरोध और भीड़तंत्र के बीच की रेखा को आज पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कई वायरल वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं होने के बाद भी जिस तरह से उनका प्रसार किया जा रहा था, उससे यही समझ आता है कि भारत को कैसे अराजक बनाया जा सकता है, इसके लिए लगता है, देश में कई शक्तियां कार्य कर रही हैं जोकि इस शांति मार्च के नाम पर एक साथ आती हुई दिखीं।

एक दूसरा दृश्य भी भारत में दिखता है, जिसमें स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और वैश्विक नेतृत्व की ओर तेजी से बढ़ना शामिल। चंद्रयान, आदित्य-एल1, डिजिटल भुगतान, नवाचार और विश्वस्तरीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी ने यह सिद्ध किया है कि जब भारतीय युवा अपनी प्रतिभा का उपयोग निर्माण में करता है, तो वह पूरी दुनिया को चकित कर देता है। दूसरी ओर जब इन्हीं युवाओं का एक वर्ग अपनी ऊर्जा हिंसा, तोड़फोड़ और भीड़ के उन्माद में व्यर्थ करता दिखता है, तो यह राष्ट्रीय क्षमता की हानि के रूप में दिखाई देता है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और चिंताजनक पक्ष सोशल मीडिया की भूमिका है। आज कुछ सेकंड का वीडियो लाखों लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर देता है। बिना सत्यापन के प्रसारित दावे, उत्तेजक भाषण और आधी-अधूरी सूचनाएं भीड़ को भड़काने का माध्यम बन जाती हैं। उन राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना चाहिए, जोकि अपने हित में देश की युवा शक्ति का गलत इस्तेमाल करते हैं। युवा शक्ति को राजनीतिक प्रदर्शन का औजार बनाना किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत कभी नहीं हो सकता। ध्यान रहे, लोकतंत्र में सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन यदि युवा पीढ़ी का चरित्र बदल गया तो उसकी भरपाई किसी राजनीतिक परिवर्तन से नहीं हो सकेगी।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा कहते थे, सपने वे नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, बल्कि सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते। उनका सपना ऐसा भारत था, जहाँ युवा प्रयोगशालाओं में शोध करें, उद्योग स्थापित करें, विज्ञान और तकनीक में दुनिया का नेतृत्व करें तथा समाज को नई दिशा दें। वास्तव में इस परिभाषा से वही भारत का वास्तविक युवा है जो निर्माण करता है, विनाश नहीं; जो समाधान खोजता है, संकट नहीं बढ़ाता; जो राष्ट्र को जोड़ता है, तोड़ता नहीं और न ही दिल्ली जैसी अराजकता बिल्डिंगों में घुसकर एवं खड़े वाहनों में तोड़-फोड़ करके फैलाता है!

आज जो भी देश में अराजकता व्याप्ति में लगे हैं, वे समझ लें कि पत्थर कभी विचार का स्थान नहीं ले सकते और भीड़ कभी चरित्र का विकल्प नहीं बन सकती। स्वामी विवेकानन्द का युवा हाथ में पुस्तक लेकर चलता है; वह किसी पर पत्थर फैककर सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट नहीं करता है, वह तो राष्ट्र की संपत्ति बढ़ाता है और समाज को संगठित करता है, इसलिए संसद मार्च की घटनाओं के बाद सबसे बड़ा प्रश्न ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) यही है कि वे अपने आन्दोलन से भारत के युवाओं को किस दिशा में ले जा रही है?

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी