वर्षा ऋतु में खान-पान और हमारा पारंपरिक स्वास्थ्य विज्ञान
आचार्य ललित मुनि हमारी परम्परा में जीवन पद्धति में भोजन केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ऋतु और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों और आयुर्वेदाचार्यों ने हजारों वर्षों के अनुभव के आधार पर यह
आचार्य ललित मुनि


आचार्य ललित मुनि

हमारी परम्परा में जीवन पद्धति में भोजन केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ऋतु और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों और आयुर्वेदाचार्यों ने हजारों वर्षों के अनुभव के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रत्येक ऋतु के अनुसार भोजन में परिवर्तन करना चाहिए। आयुर्वेद में इसे ऋतुचर्या कहा गया है। इसका उद्देश्य शरीर के दोषों का संतुलन बनाए रखना तथा ऋतु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों से रक्षा करना है। वर्षा ऋतु को आयुर्वेद में विशेष सावधानी का समय माना गया है। यह केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि शरीर की पाचन क्षमता, वातावरण और रोगों की प्रकृति में भी बदलाव का काल है। यदि इस समय खान-पान में सावधानी न बरती जाए तो अनेक प्रकार के संक्रमण, पाचन संबंधी विकार और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जन्म लेने लगती हैं

वर्षा ऋतु में क्यों बदल जाता है शरीर का स्वभाव?ग्रीष्म ऋतु की तीव्र गर्मी के बाद जब वर्षा होती है, तब वातावरण में नमी बढ़ जाती है और सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय जठराग्नि अर्थात पाचन शक्ति मंद पड़ जाती है। भोजन पहले की अपेक्षा धीरे पचता है और शरीर रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। यही कारण है कि वर्षा ऋतु में दस्त, उल्टी, टाइफाइड, हैजा, वायरल संक्रमण तथा त्वचा संबंधी रोगों की संभावना बढ़ जाती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि वर्षा के मौसम में बैक्टीरिया, वायरस और फफूंद तेजी से पनपते हैं। दूषित जल और भोजन अनेक संक्रामक रोगों का कारण बनते हैं। इसलिए इस मौसम में केवल स्वाद नहीं, बल्कि भोजन की शुद्धता, ताजगी और पाचन क्षमता सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

पूर्वजों की दूरदर्शिताआज की तरह पहले हर मौसम में हर प्रकार की सब्जियां उपलब्ध नहीं होती थीं। इसलिए हमारे पूर्वज वर्षा ऋतु आने से पहले ही उसकी तैयारी कर लेते थे। ग्रीष्म ऋतु में गेहूं, चावल, दाल, गुड़, घी और अन्य आवश्यक खाद्य पदार्थ संग्रहित कर लिए जाते थे। इसी समय दाल की बड़ी, बिजौरी, पापड़, सूखी मिर्च, अमचूर, इमली तथा विभिन्न प्रकार के अचार तैयार किए जाते थे। अनेक क्षेत्रों में सब्जियों और पत्तेदार भाजियों को काटकर धूप में सुखाया जाता था। छत्तीसगढ़ में इन्हें सुखसी, सुखड़ी, सुखौंत, खोइला अथवा खेलरा जैसे नामों से जाना जाता है। मेथी, पालक, लाल भाजी, चौलाई और अन्य सागों को सुखाकर वर्षा ऋतु में उपयोग किया जाता था। मांसाहारी समुदाय भी मछली और मांस को सुखाकर सुरक्षित रखते थे ताकि वर्षा के दिनों में ताजा मांस पर निर्भर न रहना पड़े। यह केवल भोजन संग्रह की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि मौसम के अनुकूल जीवन जीने की वैज्ञानिक पद्धति थी।

वर्षा ऋतु में क्या खाना चाहिए?आयुर्वेद वर्षा ऋतु में हल्का, गर्म और ताजा भोजन करने की सलाह देता है। मूंग की दाल, पुराना चावल, गेहूं, जौ, सादा खिचड़ी, सूप तथा कम मसालों में बना हुआ भोजन आसानी से पचता है। भोजन में अदरक, काली मिर्च, जीरा, हींग, हल्दी और धनिया जैसे मसालों का सीमित उपयोग पाचन शक्ति को बढ़ाने में सहायक माना गया है। गुनगुना पानी पीना, उबला हुआ जल प्रयोग करना तथा भोजन ताजा बनाकर खाना इस ऋतु में विशेष लाभकारी माना गया है। गुड़, घी और सीमित मात्रा में देशी मसालों का प्रयोग शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है तथा पाचन को भी सहयोग देता है।

किन खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए?भारतीय परंपरा में वर्षा ऋतु के दौरान हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन सीमित रखने की सलाह दी गई है। इसका कारण यह है कि इस मौसम में उनमें कीट, अंडे, फफूंद और रोगाणुओं की संभावना बढ़ जाती है। आज भी चिकित्सक बिना अच्छी तरह धोए और पकाए पत्तेदार सब्जियां खाने से बचने की सलाह देते हैं।

गैर-मौसमी सब्जियां और बदलती आदतेंकृषि तकनीक और संरक्षित खेती के कारण आज लगभग हर मौसम में हर प्रकार की सब्जियां उपलब्ध हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक वस्तु हर ऋतु में शरीर के लिए समान रूप से लाभकारी भी हो। अनेक गैर-मौसमी सब्जियां रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और कृत्रिम तकनीकों की सहायता से तैयार की जाती हैं। आज वर्षा ऋतु में टमाटर, प्याज या अन्य सब्जियों के महंगे होने पर व्यापक चर्चा होती है। जबकि प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या वास्तव में इस मौसम में उनका अधिक सेवन आवश्यक है? हमारे पूर्वजों ने जिस वस्तु का प्राकृतिक उत्पादन जिस ऋतु में होता था, उसी समय उसका सेवन अधिक किया। इससे शरीर भी प्रकृति के साथ तालमेल बनाए रखता था।

पारंपरिक भोजन की वैज्ञानिकताभारत के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के लिए अलग-अलग भोजन विकसित हुए। कहीं बड़ी और पापड़ का उपयोग होता था, कहीं सूखी सब्जियां बनाई जाती थीं। मसालों का चयन भी मौसम के अनुसार किया जाता था। हींग, मेथी, अदरक और काली मिर्च जैसे पदार्थ केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि पाचन सुधारने के लिए उपयोग किए जाते थे। वर्षा ऋतु में भोजन कम मात्रा में और समय पर करने की परंपरा भी थी। सूर्यास्त के बाद देर रात भोजन करने की आदत नहीं थी। आयुर्वेद के अनुसार देर रात भोजन करने से जठराग्नि कमजोर होती है और अपच, अम्लता तथा मोटापे जैसी समस्याएं बढ़ती हैं।

आयुर्वेद में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत बताया गया है;“ऋतुभुक्, हितभुक्, मितभुक्।”अर्थात् ऋतु के अनुसार भोजन करें, अपने शरीर के लिए हितकारी भोजन करें और संयमित मात्रा में भोजन करें। यदि केवल इस एक सूत्र का पालन कर लिया जाए तो अनेक रोगों से बचा जा सकता है।

प्रकृति के साथ चलना ही स्वास्थ्य का मार्गआज जीवनशैली बदल गई है। देर रात तक जागना, अनियमित भोजन, फास्ट फूड और हर मौसम में हर प्रकार का भोजन करने की आदत सामान्य हो गई है। परिणामस्वरूप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, हृदय रोग और पाचन संबंधी विकार तेजी से बढ़ रहे हैं। यह केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि हमारी भोजन संस्कृति से जुड़ा प्रश्न भी है। वर्षा ऋतु हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का संदेश देती है। यदि हम इस मौसम में हल्का, ताजा और सुपाच्य भोजन करें, दूषित एवं गैर-मौसमी खाद्य पदार्थों से बचें, समय पर भोजन करें तथा आयुर्वेद की ऋतुचर्या का पालन करें, तो अनेक बीमारियों से स्वाभाविक रूप से बच सकते हैं। प्रकृति आज भी वही है, केवल हमारी जीवनशैली बदल गई है। आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी हम अपनी पारंपरिक भोजन संस्कृति के वैज्ञानिक पक्ष को समझें। स्वस्थ जीवन का मार्ग बाजार नहीं, बल्कि प्रकृति के नियम बताते हैं। वर्षा ऋतु का संतुलित खान-पान उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी