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मुंबई,19 जूलाई ( हिट. स.) । इंसानियत का अपनापन, मरीज़ का इलाज और अटूट सेवा... कभी-कभी नामुमकिन लगने वाली चीज़ें भी इसी ताकत से मुमकिन हो जाती हैं। ठाणे रीजनल साइकेट्रिक हॉस्पिटल ने न सिर्फ़ एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को, जो 22 साल से अपने परिवार से दूर था, मानसिक रूप से ठीक किया, बल्कि उसे उत्तर प्रदेश के लोगों के पास वापस लाकर इंसानियत की एक दिल को छू लेने वाली मिसाल भी पेश की।
18 अगस्त, 2017 को राबोडी इलाके में एक अधेड़ उम्र का आदमी अकेले बैठा रोता हुआ मिला। वह किसी से बात नहीं कर रहा था और न ही खाना खा रहा था। राबोडी पुलिस स्टेशन के रमेश नागराव अंभोरे और उनके साथियों ने कोर्ट के आदेश के मुताबिक उसे ठाणे रीजनल साइकेट्रिक हॉस्पिटल में भर्ती कराया।
अस्पताल में भर्ती होने के बाद पहले छह साल तक मरीज़ ने एक भी शब्द नहीं बोला। लेकिन, हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. नेताजी मुलिक की गाइडेंस में डॉक्टर, साइकेट्रिस्ट, नर्स और स्टाफ ने इलाज, काउंसलिंग और देखभाल जारी रखी। इलाज के पॉजिटिव रिजल्ट दिखने के बाद, मरीज़ ने बताया कि उसका नाम विजय (बदला हुआ) है। लेकिन, उसे अपने गांव या परिवार के बारे में जानकारी याद नहीं थी।
हॉस्पिटल कीमनोचिकित्सकों( साइकेट्रिक )नर्स मानसी ओझाले ने उसे एक नोटबुक और पेन दिया और कई बार जानकारी लिखी। इन कोशिशों से पता चला कि वह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का रहने वाला है, जिसकी जानकारी हॉस्पिटल के सोशल सर्विस सुपरिटेंडेंट नितिन शिवड़े को दी गई।
इसके बाद, सोशल सर्विस डिपार्टमेंट ने गौरी बाजार पुलिस स्टेशन से कॉन्टैक्ट किया और मरीज़ की फोटो और ज़रूरी जानकारी भेजी। गांव के सरपंच के ज़रिए रिश्तेदारों से कॉन्टैक्ट किया गया। उस समय पता चला कि विजय 22 साल से लापता था। उसके ज़िंदा होने की बात सुनकर परिवार वाले हैरान रह गए।
इसके बाद, कई वीडियो कॉल के ज़रिए मरीज़ और परिवार से कॉन्टैक्ट किया गया। आखिर में, रिश्तेदार पुलिस स्टेशन आए और विजय को घर ले गए। गांव में खुशी से उनका स्वागत किया गया, जुलूस निकाला गया और खुशी में मिठाई बांटी गई। इसके लिए मनोचिकित्सक ( साइकेट्रिस्ट )डॉ. संदीप दिवेकर, डॉ. फैजान खान, डॉ. सुनील भदंगे, मेल अटेंडेंट विष्णु भोईर और प्रहलाद वाघमारे वगैरह ने बहुत मेहनत की।
ठाणे मनोरोग चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ नेताजी मुलिक ने कहा -अगर सही इलाज, सब्र और इंसानी मदद दी जाए, तो दिमागी तौर पर बीमार इंसान भी खुशी-खुशी अपने परिवार के पास लौट सकता है। मरीज़ के चेहरे पर मुस्कान ही हमारी सेवा की असली प्रसन्नता है।.
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हिन्दुस्थान समाचार / रवीन्द्र शर्मा