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खूंटी, 19 जुलाई (हि.स.)। झारखंड के खूंटी जिले का लांदुपडीह गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। सरकार और प्रशासन भले ही ग्रामीण विकास के बड़े-बड़े दावे करते हों, लेकिन इस सुदूर पर्वतीय गांव की हकीकत उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। गांव तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंची है। इसका परिणाम यह है कि यहां न एंबुलेंस पहुंच पाती है, न ममता वाहन और न ही कोई अन्य चारपहिया वाहन। बीमार मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को आज भी खाट पर लादकर कई किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। यही मजबूरी कई बार जीवन और मौत के बीच की दूरी तय कर देती है।
कुछ दिन पहले घटी एक दर्दनाक घटना ने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया। प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक गर्भवती महिला को उसके परिजन खाट पर लादकर अस्पताल ले जा रहे थे। गांव से अस्पताल तक जाने वाला रास्ता इतना कठिन और दुर्गम था कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही महिला का रास्ते में प्रसव हो गया। नवजात ने जन्म तो लिया, लेकिन समय पर चिकित्सकीय सहायता नहीं मिलने के कारण कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई।
इस घटना को याद करते हुए आज भी ग्रामीणों की आंखें नम हो जाती हैं। उनका कहना है कि यदि गांव तक सड़क बनी होती और एंबुलेंस समय पर पहुंच जाती, तो शायद नवजात की जान बचाई जा सकती थी। ग्रामीणों के अनुसार यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की दर्दनाक तस्वीर है।
गांव में जब कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तब उसके इलाज की शुरुआत अस्पताल से नहीं, बल्कि खाट से होती है। ग्रामीण मरीज को खाट पर लिटाकर कई किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचाते हैं। वहां से किसी तरह वाहन की व्यवस्था कर अस्पताल ले जाया जाता है। इस प्रक्रिया में बहुमूल्य समय निकल जाता है, जो कई बार मरीज के जीवन के लिए निर्णायक साबित होता है।
बरसात के दिनों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। कच्चा रास्ता कीचड़ में तब्दील हो जाता है, जिससे पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे समय मरीजों को अस्पताल पहुंचाना ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव तक ममता वाहन नहीं पहुंच पाने के कारण गर्भवती महिलाओं की नियमित स्वास्थ्य जांच प्रभावित होती है। प्रसव के समय उन्हें अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं होता। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य लगातार खतरे में बना रहता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ शिक्षा की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। लांदुपडीह गांव में आज तक न प्राथमिक विद्यालय है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र। छोटे बच्चों को शिक्षा के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता है। खराब रास्ते और लंबी दूरी के कारण कई बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाते। आर्थिक और भौगोलिक कठिनाइयों के चलते कई अभिभावक बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छुड़वा देते हैं।
हालांकि, सुविधाओं के अभाव के बावजूद गांव के कुछ युवाओं ने हार नहीं मानी। रानी नाग, रुपु मुंडा और दस मुंडा ने कठिन परिस्थितियों में भी स्नातक तक की शिक्षा पूरी कर गांव के अन्य बच्चों के लिए प्रेरणा का उदाहरण प्रस्तुत किया है। इन युवाओं का कहना है कि यदि गांव में स्कूल, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होतीं, तो यहां के कई और बच्चे भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर बेहतर भविष्य बना सकते थे।
गांव में महिला मंडल का गठन नहीं हुआ है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण, स्वरोजगार और स्वयं सहायता समूहों की गतिविधियां भी यहां लगभग न के बराबर हैं। सरकारी योजनाओं की जानकारी सीमित रूप से ही गांव तक पहुंचती है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से गांव में कोई बड़ा विकास कार्य नहीं हुआ।
गांव के मुखिया मंगा नाग का कहना है कि लांदुपडीह की सबसे बड़ी आवश्यकता पक्की सड़क है। उनका मानना है कि सड़क बनते ही गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की तस्वीर बदल जाएगी। एंबुलेंस गांव तक पहुंचेगी, बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा सकेंगे और सरकारी योजनाओं का लाभ भी लोगों तक आसानी से पहुंचेगा।
मुखिया ने बताया कि सड़क निर्माण की मांग को लेकर विधायक राम सूर्या मुंडा, सांसद कालीचरण मुंडा तथा प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार ज्ञापन सौंपा गया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।
ग्रामीण विकास विभाग, ग्रामीण कार्य प्रमंडल, खूंटी के कनीय अभियंता मनोज कुमार ने बताया कि विभाग को ग्रामीणों की शिकायत प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण के संबंध में जल्द ही आवश्यक प्रक्रिया शुरू कर ठोस पहल की जाएगी।
लांदुपडीह की कहानी केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। यह उन सैकड़ों दुर्गम गांवों की कहानी है, जहां आज भी विकास सड़क के अभाव में रुक जाता है। जब किसी नवजात की मौत केवल इसलिए हो जाए कि एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी, तब विकास के दावों की वास्तविकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लांदुपडीह के लोग किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी और पहली जरूरत एक पक्की सड़क है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि जिस दिन सड़क गांव तक पहुंचेगी, उसी दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और विकास की राह भी उनके गांव तक पहुंच जाएगी। तब शायद किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में प्रसव नहीं करना पड़ेगा और किसी नवजात की जान केवल सड़क के अभाव में नहीं जाएगी।----------
हिन्दुस्थान समाचार / अनिल मिश्रा