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अयोध्या, 14 जुलाई (हि.स.)। श्री मणिराम दास छावनी में साकेतवासी संत कृपालु रामदास महाराज (पंजाबी महाराज) की स्मृति में राधेश्याम शास्त्री महाराज ने उनके जीवन पर भावपूर्ण संस्मरण सुनाया। संस्मरण सुनकर उपस्थित संत, भक्त और श्रद्धालु भावुक हो उठे। शास्त्री महाराज ने कहा कि अयोध्या सिद्धों की सराय है और इसी सराय के अनमोल हीरा थे पूज्य पंजाबी महाराज। ऐसे महापुरुष कभी नहीं मरते, वे अपने आदर्शों और तपस्या के रूप में सदैव जीवित रहते हैं।
राधेश्याम शास्त्री महाराज ने बताया कि लगभग 50 वर्ष पूर्व 26-27 वर्ष का एक तेजस्वी पंजाबी युवक वैराग्य की भावना से प्रेरित होकर चित्रकूट के रास्ते अयोध्या पहुंचा। उसके भजन, सेवा और समर्पण से प्रभावित होकर पूज्य महंत श्री नृत्यगोपाल दास जी महाराज ने उसे दीक्षा देकर 'कृपालु रामदास' नाम प्रदान किया। उसी क्षण से उसकी जीवनधारा पंजाब से सरयू तट स्थित अयोध्या की ओर सदा के लिए मुड़ गई। उन्होंने कहा कि दीक्षा के बाद वह संत कभी पंजाब नहीं लौटा। गोमुख, गंगोत्री, प्रयाग, पुष्कर सहित अनेक तीर्थों में योग, ध्यान, तप और साधना का अमृत ग्रहण करते हुए जब वह पुनः अयोध्या आया तो शीघ्र ही संत समाज और श्रद्धालुओं के बीच 'पंजाबी बाबा', 'पंजाबी महाराज' और 'पंजाबी भगवान' के नाम से विख्यात हो गया। मणिराम दास छावनी में उन्होंने ट्रस्ट के सचिव के रूप में गुरुदेव के सबसे विश्वसनीय सहयोगी बनकर लगभग पांच दशक तक निष्ठापूर्वक सेवा की। शास्त्री महाराज ने बताया कि पंजाबी महाराज का जीवन सादगी, तप और त्याग की अद्भुत मिसाल था। छावनी की साधारण दो छोटी कोठरियों में रहते हुए उन्होंने कभी धन, संपत्ति, भूमि या भवन के प्रति मोह नहीं रखा। उनकी साधु-चर्या प्रतिदिन रात्रि दो से ढाई बजे प्रारंभ हो जाती थी। भगवान शालग्राम, गुरुदेव और ऋषि जी महाराज की उपासना में उनका अधिकांश समय व्यतीत होता था। वे एकांत साधना, भजन, गुरु-भक्ति और परमार्थ के पर्याय बन चुके थे।उन्होंने कहा कि पंजाबी महाराज ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सच्चे संत का वैभव उसके त्याग, सेवा और साधना में होता है, न कि भौतिक संसाधनों में। लगभग पांच दशक तक उन्होंने मणिराम दास छावनी में रहकर साधुता, परमार्थ, एकांत साधना और आध्यात्मिक अनुशासन का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जो संत समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा।
राधेश्याम शास्त्री महाराज ने अपने संस्मरण के अंत में कहा कि पंजाबी महाराज का जीवन संत, साधक और गृहस्थ समाज के लिए प्रकाश-स्तंभ के समान है। उनकी पावन स्मृतियां सदैव साधना के पथ पर चलने की प्रेरणा देती रहेंगी। ऐसा अवसर आ गया कि गुरु अपने शिष्य को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे, मणिराम दास छावनी के पीठाधीश्वर महंत नृत्य गोपाल दास इस अनमोल शिष्य के गुरु है। पंजाबी भगवान के कुछ चुनिंदा शिष्य हैं जिनमें गुजरात के डॉ. रंजीत सिंह, मुंबई के डॉ. चंद्रमौली द्विवेदी, लखनऊ के शरद जी, प्रमोद पांडेय, शत्रुघ्न कसौधन सहित दर्जनों की संख्या हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / पवन पाण्डेय