अशोक मंडल की नर्सरी बनी रोजगार और आत्मनिर्भरता की मिसाल
धनबाद, 24 जून (हि.स.)। कहते हैं अगर कुछ अलग करने का जुनून हो तो कोई भी काम छोटा नहीं होता। नौकरी की सुरक्षित राह छोड़कर स्वरोजगार का रास्ता चुनने वाले धनबाद के अशोक मंडल आज अपनी मेहनत से एक सफल नर्सरी संचालक बन चुके हैं। कभी बैंक में महज 9200 रुपये
अपनी नर्सरी के बारे में जानकारी देते अशोक मंडल


लहलहाता अशोक मंडल का नर्सरी


धनबाद, 24 जून (हि.स.)। कहते हैं अगर कुछ अलग करने का जुनून हो तो कोई भी काम छोटा नहीं होता। नौकरी की सुरक्षित राह छोड़कर स्वरोजगार का रास्ता चुनने वाले धनबाद के अशोक मंडल आज अपनी मेहनत से एक सफल नर्सरी संचालक बन चुके हैं। कभी बैंक में महज 9200 रुपये की नौकरी करने वाले अशोक मंडल ने पौधों की दुनिया में कदम रखा और आज उनका कारोबार डेढ़ लाख से ज्यादा पौधों तक पहुंच चुका है।

धनबाद के धोकरा निवासी अशोक मंडल पहले एसबीआई जर्नल ऑफिस, बैंक मोड़ में मैसेंजर के पद पर काम करते थे। करीब सात साल तक नौकरी करने के बाद साल 2014 में उन्होंने नौकरी छोड़कर खुद का काम शुरू करने का फैसला लिया।

बचपन से ही खेती और पौधों में रुचि रखने वाले अशोक मंडल को बैंक में काम करने के दौरान एग्रीकल्चर से जुड़े एक मैनेजर से काफी कुछ सीखने का मौका मिला। बीज तैयार करने, पौधों की देखभाल, मिट्टी की तैयारी और नर्सरी संचालन की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने इसी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने का फैसला किया।

साल 2019 में उन्होंने छोटे स्तर पर करीब 10 हजार पौधों के साथ नर्सरी की शुरुआत की। शुरुआती मेहनत रंग लाई और उन्हें अच्छा मुनाफा मिला। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने कारोबार का विस्तार करना शुरू किया।

आज उनकी नर्सरी में डेढ़ लाख से ज्यादा पौधे मौजूद हैं। यहां फूलों, फलदार, औषधीय, सब्जियों और बागवानी से जुड़े 200 से ज्यादा किस्मों के पौधे उपलब्ध हैं।

अशोक मंडल की नर्सरी अब सिर्फ धनबाद तक सीमित नहीं है। जामताड़ा, रांची, गिरिडीह, गोड्डा, पाकुड़, हजारीबाग और डाल्टनगंज सहित कई जिलों से लोग यहां पौधे खरीदने पहुंचते हैं और ऑर्डर भी देते हैं।

नर्सरी ने न सिर्फ अशोक मंडल को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि कई लोगों को रोजगार भी दिया। वर्तमान में करीब 08 लोग स्थायी रूप से काम कर रहे हैं, जबकि सीजन के समय यह संख्या बढ़कर 12 से 15 तक पहुंच जाती है।

हालांकि इस सफर में चुनौतियां भी हैं। अशोक मंडल का कहना है कि अभी तक उन्हें किसी सरकारी सहायता या सब्सिडी का लाभ नहीं मिला है। सिंचाई के लिए बिजली की समस्या के कारण कई बार पौधों की देखभाल प्रभावित होती है।

अशोक मंडल की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो नौकरी की तलाश में हैं। यह साबित करती है कि मेहनत, लगन और सीखने की इच्छा के दम पर स्वरोजगार का रास्ता अपनाकर न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दिया जा सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राहुल कुमार झा