वेद मंदिर योल में यज्ञानुष्ठान के 63वें दिन गूंजा वेद ज्ञान, सनातन सत्य पर दिया विशेष उपदेश
कठुआ, 13 जून (हि.स.)। वेद मंदिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 63वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को गहन वैदिक ज्ञान से अवगत कराया। अपने उपदेश में स्वामी जी ने अथर्ववेद काण्ड 10 सूक्त 8 तथा श्वेताश्वतर
Vedic wisdom resonated at Ved Mandir, Yol, on the 63rd day of the *Yajna* ceremony; a special discourse on *Sanatan* truth was delivered.


कठुआ, 13 जून (हि.स.)। वेद मंदिर योल में चल रहे 78 दिवसीय चारों वेदों के यज्ञानुष्ठान के 63वें दिन स्वामी राम स्वरूप जी योगाचार्य ने श्रद्धालुओं को गहन वैदिक ज्ञान से अवगत कराया।

अपने उपदेश में स्वामी जी ने अथर्ववेद काण्ड 10 सूक्त 8 तथा श्वेताश्वतरोपनिषद् के श्लोक 1/14 का उल्लेख करते हुए समझाया कि जैसे काष्ठ में अग्नि विद्यमान होती है परन्तु वह प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती उसी प्रकार ईश्वर भी प्रत्येक जीव में विद्यमान है परंतु साधना के बिना उसका अनुभव नहीं होता। उन्होंने बताया कि जब काष्ठ रूपी इंधन को जलाया जाता है तो अग्नि प्रकट हो जाती है। ठीक इसी प्रकार जब साधक अपने शरीर को ‘नीचे की अरणी’ और प्रभु के नाम को ‘ऊपर की अरणी’ बनाकर ध्यान व नाम-जप करता है तो इस साधना रूपी प्रयास से शरीर में निहित निराकार, ज्योतिस्वरूप, सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापक ब्रह्म का अनुभव होता है।

स्वामी जी ने कहा कि वेद जो अनादि और शाश्वत ज्ञान का स्रोत हैं यह बताते हैं कि जो मनुष्य वेदानुसार ईश्वर का नाम जपता है कर्म, उपासना और ज्ञान को अपनाता है। वह अंततः प्रभु में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

उन्होंने अथर्ववेद के उक्त काण्ड के 23वें मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि एनम् सनातनम् आहु अर्थात् ईश्वर को सनातन कहा गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वेदों में सनातन शब्द का उल्लेख प्राचीन काल से विद्यमान है और यह ईश्वर की नित्य, अजन्मा और अविनाशी सत्ता को दर्शाता है। स्वामी जी ने कहा कि प्रभु सदा से नित्य हैं, जन्म-मृत्यु से परे हैं और कभी नष्ट नहीं होते। इसी परम सत्ता की उपासना के लिए वेदों का अनन्त और अविनाशी ज्ञान मानव को प्रेरित करता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और वैदिक ज्ञान का लाभ प्राप्त किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया