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- देवस्थान की जमीन बचाने के लिए राज्यभर में विरोध-प्रदर्शन किए जाएंगे
- घनवट का सरकार से सवाल- वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और हिंदू मंदिरों की भूमि के मामले में भेदभाव क्यों
नागपुर, 06 मई (हि.स.)। महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा देवस्थान की भूमि और अन्य मंदिर भूमि को कुलों या किरायेदारों को हस्तांतरित करने के लिए एक नया कानून प्रस्तावित किया जा रहा है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने इस नीति का जोरदार विरोध किया है। उसका कहना है कि क्या यह हिंदू मंदिरों के अस्तित्व को समाप्त करने और भू-माफियाओं की जेबों को भरने की चाल है। महासंघ की मांग है कि सरकार को इस अवैध और अन्यायपूर्ण मसौदे को तुरंत वापस लेना चाहिए।
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय आयोजक सुनील घनवट ने नागपुर के प्रेस क्लब में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में सरकार को चेतावनी दी कि अगर उसने प्रस्तावित मसौदा तुरंत वापस नहीं लिया तो राज्य भर के मंदिरों की ओर से एक मजबूत जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।
इस अवसर पर अनूप जैसवाल (महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की राज्य कोर समिति के सदस्य), पूज्य भागीरथी महाराज (अध्यक्ष, गुरुकुल सेवा संस्था, नागपुर), दिलीप कुकडे (श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के अध्यक्ष और महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नागपुर जिला संयोजक), विनीत पखोडे (श्री पिंगलदेवी संस्था, अमरावती), अधिवक्ता अभिजीत बजाज (अमरावती), चेतन राजहंस (राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था), रामनारायण मिश्रा (संयोजक, महाराष्ट्र मंदिर महासंघ, विदर्भ) उपस्थित थे।
इस बारे में विस्तार से बताते हुए सुनील घनवट ने कहा, भारतीय कानून के अनुसार, एक हिंदू देवता (मूर्ति) एक 'न्यायिक व्यक्ति' है। इसलिए, देवता देवस्थानम की संपत्ति के मूल मालिक हैं और महाराष्ट्र राज्य सरकार मुख्य रूप से महाराष्ट्र सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1950 के तहत नियामक, प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों के माध्यम से सार्वजनिक मंदिरों को नियंत्रित करती है। न्यासियों और सरकार को मंदिरों के मूल मालिक की भूमि पारस्परिक न्यासियों या निष्पादकों को आवंटित करने का कोई अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के स्थापित निर्णयों के अनुसार, देवस्थानम भूमि का स्वामित्व कुलों को नहीं सौंपा जा सकता है। इसके बावजूद, इस कानून को लागू करना संविधान के अनुच्छेद 25,26 और 300-ए में निहित मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की सरकार से 5 प्रमुख मांगें रखी गई हैं। इसमें कहा गया है कि गुजरात राज्य की तर्ज पर महाराष्ट्र में भूमि हड़पने विरोधी सख्त अधिनियम लागू किया जाना चाहिए और देवस्थान की भूमि हड़पने वालों को 14 साल के कठोर कारावास और गैर-जमानती सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। इसके साथ ही पिछले 25 वर्षों में सभी देवस्थान भूमि के हस्तांतरण, फर्जी रिकॉर्ड और अतिक्रमण की पूरी तरह से जांच करने के लिए एक उच्च पदस्थ न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (एस. आई. टी.) का गठन किया जाना चाहिए। देवस्थान भूमि के संबंध में राजस्व और दीवानी न्यायालयों में लंबित विवादों के त्वरित निपटान के लिए विशेष त्वरित अदालतों की स्थापना की जानी चाहिए और 6 महीने के भीतर मामलों का निपटारा किया जाना चाहिए।
सनातन संस्था के राष्ट्रीय प्रवक्ता चेतन राजहंस ने कहा कि देवस्थान की भूमि केवल राजस्व विभाग में एक आंकड़ा नहीं है बल्कि वे महाराष्ट्र की संस्कृति, आस्था और सामाजिक जीवन की बुनियादी नींव हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज के आदर्शों को सामने रखते हुए सरकार को 'न्यासी' के रूप में धर्मार्थ संपत्तियों की रक्षा करनी चाहिए। सरकार को मंदिर के मामलों में प्रशासनिक रूप से हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि इन उद्देश्यपूर्ण और कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए इस कानून को लागू करने का प्रयास किया जाता है तो पूरा हिंदू समाज, सभी मंदिर, भक्त, पुजारी और राज्य भर के विभिन्न हिंदू सामाजिक और आध्यात्मिक संगठन एक साथ आएंगे और एक आंदोलन करेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी