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जयपुर, 12 मई (हि.स.)। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थानी भाषा के संरक्षण व इसे शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने से जुड़े मामले में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह राजस्थानी भाषा को चरणबद्द तरीके से सभी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने और लागू करने की नीति बनाए। जस्टिस विक्रम नाथ एवं जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह निर्देश पदम मेहता व अन्य की एसएलपी पर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थानी भाषा, जो अत्यंत समृद्ध ऐतिहासिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्व रखती है, उसे पहले ही कई विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में मान्यता एवं स्वीकृति मिल चुकी है। राजस्थान राज्य अब ऐसी उपयुक्त नीति तैयार करे जिसके तहत राजस्थानी भाषा को संपूर्ण शैक्षणिक व्यवस्था में शामिल किया जाए, जिसमें प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा भी सम्मिलित हो। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश की पालना रिपोर्ट 30 सितंबर तक पेश करने के लिए कहा है।
एसएलपी में प्रार्थी पदम मेहता की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर एडवोेकेट मनीष सिंघवी ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350-ए, बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29, तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में जहाँ तक संभव हो, बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। राजस्थानी भाषा करोड़ों लोग बोलते हैं, लेकिन इसके बावजूद राजस्थानी भाषा को रीट परीक्षा के ढांचे अथवा शिक्षण माध्यम में शामिल नहीं किया है। जबकि राजस्थान विधानसभा ने दिनांक 25 अगस्त 2003 को ही एक प्रस्ताव पारित कर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा जारी कर दी थी। जवाब में एएजी शिवमंगल शर्मा ने कहा कि इस संबंध में सरकार उपयुक्त निर्णय लेगी। राज्य सरकार ने कभी यह रुख नहीं अपनाया कि राजस्थानी भाषा को शैक्षणिक व्यवस्था में शामिल करना गलत अथवा अस्वीकार्य है। हालांकि पूर्व में अपने जवाब में कहा था कि वर्तमान में राजस्थानी भाषा प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के स्वीकृत पाठ्यक्रम ढांचे का हिस्सा नहीं है और इसी कारण इसे रीट में शामिल नहीं किया गया। राज्य सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत मातृभाषा आधारित शिक्षा एवं बहुभाषीय शिक्षण से संबंधित क्लॉज 4.11 के क्रियान्वयन के लिए विभिन्न टास्क फोर्स पहले ही बना चुकी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक