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सुपौल, 10 अप्रैल (हि.स.)। कोसी क्षेत्र के इस उदयीमान साहित्यकार ने एक-साथ लेखक, कवि, दार्शनिक, समाजशास्त्री तथा प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाई है।
इसी कड़ी में मैथिली कवि रघुनाथ मुखिया का जन्म 6 जनवरी 1971 को सुपौल जिले के सदर प्रखंड के बलहा पंचायत के भरनी वार्ड 6 में मल्लाह परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम जगदीश मुखिया और माता का नाम दुर्गा देवी है। माता-पिता साधारण परिवार से थे। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त करने के बाद उन्होंने पी.एन. कॉलेज, पटना से इतिहास विषय में स्नातक (प्रतिष्ठा) किया। स्नातक के बाद वे साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हो गए और मैथिली में लेखन कार्य शुरू किया। कोमल मन और प्रगतिशील विचारों के उपासक रघुनाथ मुखिया ने अपनी रचनाओं से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई।
रघुनाथ मुखिया एक साथ रचनाकार, अनुवादक, व्यंग्यकार, आलोचक, संपादक तथा उच्च कोटि के रंगकर्मी भी हैं। इनके छिटपुट रचनाएं हिंदी में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी वार्ताएं तथा कविताएं जनपथ (गाजियाबाद), आकांक्षा तथा संस्कृति केन्द्र, पटना से प्रसारित होती रही हैं। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन केंद्र, पटना द्वारा प्रसारित ‘गीत-गंधर्व’ कार्यक्रम में भी वे शास्त्रीय कला पर चर्चा के स्रोत-संसाधन के रूप में भाग ले चुके हैं।
उन्होंने पटना के विभिन्न रंगमंचों पर कला प्रदर्शन भी किया है। नेपाल तथा देश के कई प्रमुख शहरों जैसे सहरसा, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पटना, वाराणसी, कोलकाता और दिल्ली में अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं का दिल जीतने में सफल रहे हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में कर्णगीत, अंतिका, मिथिला-दर्शन, घर-बाहर, मिथिला-दर्पण आदि शामिल हैं। इसके अलावा मैथिली की सैकड़ों सशक्त रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका काव्य-संग्रह ‘इंडियान हूँवा’ वर्ष 2018 में प्रकाशित हुआ, जबकि 2020 में उन्हें जितेन्द्र मिश्र साहित्य सम्मान से नवाजा गया। रघुनाथ मुखिया की कविताएं मानवीय सरोकारों से परिपूर्ण होने के कारण उन्हें “जनकवि” के रूप में भी जाना जाता है।
हाल ही में वे साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित राष्ट्रीय साहित्योत्सव में भाग लेकर मिथिला की धरती पर लौटे हैं। यह कार्यक्रम 30 मार्च से 3 अप्रैल तक भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से नई दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस साहित्य उत्सव में नेपाल सहित विभिन्न देशों और भारत की करीब 90 भाषाओं के लगभग 700 कवि, लेखक, रचनाकार, आलोचक और समीक्षक शामिल हुए।
हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र