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जयपुर, 08 मार्च (हि.स.)। हिंदू परंपरा में स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ा पर्व शीतलाष्टमी 11 मार्च (बुधवार) को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इस दिन शीतला माता की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि,आरोग्य और रोगों से रक्षा की कामना की जाती है। पर्व की विशेषता यह है कि माता को बासी पकवानों का भोग लगाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बासौड़ा’ कहा जाता है।
पंडित राजेश शर्मा ने बताया कि शीतलाष्टमी हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन शीतला माता को एक दिन पहले तैयार किए गए शीतल भोजन का भोग अर्पित किया जाता है। इस बार शीतला अष्टमी का पूजन मुहूर्त सुबह 6:03 बजे से शाम 5:56 बजे तक रहेगा।
शीतलाष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी को घरों में राबड़ी, दही, पुए, कांजी बड़े, दही बड़े, बेजड़, बाजरे की रोटी, पूड़ी-पकौड़ी, पंचकूटे का साग, कढ़ी-चावल सहित कई प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। अष्टमी के दिन इन्हीं पकवानों का माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करती हैं और परिवार की कुशलता की कामना करती हैं।
इस दिन महिलाएं प्रातः स्नान कर व्रत रखती हैं और शीतला माता को नीम के पत्ते, हल्दी, रोली और जल अर्पित कर पूजा करती हैं। कई स्थानों पर नीम की पत्तियों से घर की शुद्धि भी की जाती है।
पंडित शर्मा के अनुसार शीतला माता की पूजा का धार्मिक के साथ स्वास्थ्य से भी संबंध है। मान्यता है कि माता की आराधना से चेचक, खसरा, चिकनपॉक्स और मौसमी संक्रमण जैसे रोगों से रक्षा होती है। प्राचीन समय में जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब लोग इसे रोगों से बचाव का आध्यात्मिक उपाय मानते थे।
राजस्थान सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में शीतलाष्टमी को ‘बासौड़ा’ के रूप में मनाया जाता है। जयपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर सहित कई शहरों के शीतला माता मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होगी। श्रद्धालु मंदिरों और नीम के पेड़ों के नीचे पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश