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अनूपपुर, 08 मार्च (हि.स.)। विश्व महिला दिवस के अवसर पर ऐसी महिलाओं की जीवनगाथा प्रेरणा देती है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने साहस, परिश्रम और संकल्प से असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कीं। ऐसी ही प्रेरक शख्सियत हैं प्रतीक्षा प्रमोद टोंडवलकर, जिन्होंने जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव के बीच संघर्ष करते हुए भारतीय स्टेट बैंक में स्वीपर से सहायक महाप्रबंधक तक का लंबा सफर तय किया।
उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद आध्यात्मिक जीवन की ओर भी कदम बढ़ाया और पवित्र पुण्य सलिला मां नर्मदा की परिक्रमा प्रारंभ की और लगभग 111 दिनों की कठिन पैदल यात्रा करते हुए प्रतिदिन लगभग 25 से 30 किलोमीटर चलकर 28 फरवरी 2026 को अपनी परिक्रमा पूर्ण की।
प्रतीक्षा प्रमोद टोंडवलकर के अनुसार महाराष्ट्र के पुणे में जन्मी टोंडवलकर साधारण परिवार से आती हैं। उनके पिता गंगाराम केवड़े (85 वर्ष) जूता-चप्पल की छोटी दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे, जबकि माता श्रीमती गंगूबाई केवड़े (79 वर्ष) गृहिणी रहीं। अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाली टोंडलकर की प्रारंभिक शिक्षा सातवीं कक्षा तक ही हो पाई थी। सिर्फ 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक में स्वीपर के पद पर अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम शुरू किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके मन में शिक्षा प्राप्त करने की प्रबल इच्छा थी।
उन्होंने नौकरी करते हुए स्वाध्यायी परीक्षार्थी के रूप में पढ़ाई जारी रखी और दसवीं कक्षा 60% अंकों के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद कॉमर्स विषय लेकर हायर सेकेंडरी परीक्षा 52% अंकों से उत्तीर्ण की। दिन में बैंक की नौकरी और रात में पढ़ाई, यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। उन्होंने आगे एसएनडीटी कॉलेज, मुंबई से पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से मनोविज्ञान विषय में बी.ए. की डिग्री भी प्राप्त की। उनकी मेहनत और लगन के कारण बैंक में लगातार पदोन्नतियाँ मिलती गईं। 1990 में प्रमोशन, 1995 में क्लर्क, और 2003 में ट्रेनिंग ऑफिसर के पद पर पदोन्नति मिली। इसके बाद उन्होंने बैंकिंग की विभागीय परीक्षाएँ (ग्रेड 1, 2, 3, 4) सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कीं और अंततः ग्रेड-5 में भारतीय स्टेट बैंक के सहायक महाप्रबंधक पद तक पहुँचीं।
31 मई 2024 को उन्होंने भारतीय स्टेट बैंक के सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की। उनके इस सफर में उनके पति स्वर्गीय प्रमोद टोंडलकर का महत्वपूर्ण सहयोग रहा, जो हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। फरवरी 2019 में उनके पति का निधन हो गया, लेकिन उन्होंने जीवन के संघर्षों के बीच अपने हौसले को कमजोर नहीं होने दिया। परिवार की बात करें तो टोंडवलकर के दो बेटे और एक बेटी हैं। बड़ा बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत है। छोटा बेटा उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी में बी.ए. की पढ़ाई कर रहा है। उनकी बेटी दुबई में फूड पेस्ट्री का कोर्स करने के बाद शेफ के पद पर कार्यरत है और उसका विवाह भी हो चुका है। वर्तमान में श्रीमती टोंडलकर अपने बड़े बेटे के साथ पुणे में निवास करती हैं, जहाँ बेटा-बहू उनका पूरा ध्यान और सेवा-सत्कार करते हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की ओर भी कदम बढ़ाया। उन्होंने बताया कि उन्होंने पवित्र पुण्य सलिला मां नर्मदा के बारे में सुना था कि उनकी परिक्रमा अत्यंत पुण्यदायी होती है और श्रद्धा से करने पर मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसी भावना से उन्होंने ओंकारेश्वर से मां नर्मदा की परिक्रमा प्रारंभ की और लगभग 111 दिनों की कठिन पैदल यात्रा करते हुए प्रतिदिन लगभग 25 से 30 किलोमीटर चलकर 28 फरवरी 2026 को अपनी परिक्रमा पूर्ण की। नर्मदा परिक्रमा के दौरान वे पवित्र नगरी अमरकंटक भी पहुँचीं, जहाँ तट परिवर्तन एवं जल परिवर्तन की परंपरा निभाई। इस पूरी यात्रा में उनकी हमउम्र सहेली सुनीता गायकवाड भी उनके साथ रहीं।
उन्होंने बताया कि नर्मदा परिक्रमा के दौरान उन्हें कहीं भी असुरक्षा या कठिनाई का अनुभव नहीं हुआ। हर स्थान पर श्रद्धालु और स्थानीय लोग सेवा भाव से परिक्रमावासियों की सहायता करते हैं। उनका कहना है कि मां नर्मदा विश्व की ऐसी अद्भुत नदी हैं जिनकी परिक्रमा की जाती है और लाखों श्रद्धालु यह तपस्वी यात्रा करते हैं। टोंडवलकर कहती हैं कि उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वह महिला हैं और यह यात्रा कठिन होगी। उनके शब्दों में “मां नर्मदा भी तो मां हैं। जब मां का आशीर्वाद साथ हो तो कोई कठिनाई महसूस नहीं होती।”
विश्व महिला दिवस के अवसर पर प्रतीक्षा प्रमोद टोंडवलकर का संदेश विशेष रूप से प्रेरणादायक है। वह कहती हैं कि“शिक्षा एक ऐसा अमृत है, जो भी इसे ग्रहण करता है वह निरंतर आगे बढ़ता जाता है। मैंने पढ़ाई कभी नहीं छोड़ी और हमेशा आगे बढ़ने की कोशिश करती रही। माता-पिता का सहयोग और अपने संकल्प ने मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया।”यह जीवन यात्रा इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, शिक्षा और परिश्रम के बल पर कोई भी व्यक्ति जीवन में ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है। विश्व महिला दिवस के अवसर पर उनका संघर्ष और सफलता समाज की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला