समावेशी विकास और सामाजिक न्याय की दिशा में अग्रसर हिमाचल : सुखविंदर सिंह सुक्खू
मंडी, 15 मार्च (हि.स.)। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री सूर्यकांत का हिमाचल प्रदेश आने पर स्वागत किया और उन्हें दोबारा प्रदेश में आने का न्यौता दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के प्रत्येक नागरिक तक न्य
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू संबोधित करते हुए।


मंडी, 15 मार्च (हि.स.)। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री सूर्यकांत का हिमाचल प्रदेश आने पर स्वागत किया और उन्हें दोबारा प्रदेश में आने का न्यौता दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश के प्रत्येक नागरिक तक न्याय और अपने अधिकारों की पहुंच सुनिश्चित करना राज्य सरकार का संकल्प है। उन्होंने कहा कि हम संविधान की भावना के अनुरूप समावेशी विकास और सामाजिक न्याय की दिशा में काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और पारदर्शी प्रशासन के माध्यम से हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हर नागरिक को समान अवसर प्राप्त हो और लोकतंत्र की जड़ें और अधिक मजबूत हों।

सुक्खू ने कहा कि प्रदेश सरकार ने लगभग 6000 अनाथ बच्चों को ‘चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट’ के रूप में अपनाया है। इसके लिए देश का पहला कानून बनाया गया है। बेटियों की शादी की आयु को बढ़ाकर 21 वर्ष किया गया है, जिससे उन्हें लड़कों के समान अधिकार और अवसर मिल सकें। बेटियों को समान अधिकार देते हुए सरकार ने 150 बीघा तक की पैतृक संपत्ति में बेटियों को भी बराबर का अधिकार प्रदान किया है। पहले यह अधिकार केवल बेटों तक सीमित था। विधवा महिलाओं के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘इंदिरा गांधी सुख शिक्षा योजना’ शुरू की गई है, जिसके तहत राज्य सरकार उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रही है। राजस्व लोक अदालतों का आयोजन कर सरकार ने लगभग साढ़े पांच लाख लंबित मामलों का निपटारा किया है, जो कई वर्षों से लंबित पड़े थे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान केवल एक क़ानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र के मूल आदर्शों, मूल्यों और आकांक्षाओं का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि संविधान के शिल्पकार डॉ. भीम राव अंबेडकर का योगदान सदैव याद रहेगा, जिन्होंने संविधान निर्माण का नेतृत्व करते हुए यह सुनिश्चित किया था कि भारत का लोकतंत्र समानता, न्याय और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित हो। उन्होंने कहा कि मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्य भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। यदि हम अपने अधिकारों का लाभ उठाना चाहते हैं, तो हमें अपने कर्तव्यों का भी पूरी निष्ठा से पालन करना होगा।

उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश को अपने संवैधानिक अधिकार के रूप में मिलने वाला राजस्व घाटा अनुदान बन्द कर दिया गया है, जो हमारे राज्य की वित्तीय स्थिति पर बहुत बड़ा संकट है। यह अनुदान हिमाचल को संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत दिया जा रहा था तथा वर्ष 1952 से शुरू हुई इस व्यवस्था के तहत पिछले 73 वर्षों से हिमाचल प्रदेश को यह ग्रांट निरंतर मिल रही थी।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा