क्या जाति हिंदू समाज की समस्या है या औपनिवेशिक व्याख्या की उपज?
दीपक कुमार द्विवेदी
कभी-कभी लगता है कि हम अपने ही इतिहास को किसी और की आंखों से पढ़ रहे हैं। जब आप अपनी सभ्यता को अपनी दृष्टि से नहीं, बल्कि अपने शासक की दृष्टि से देखते हैं, तब फिर ये तय है कि धीरे-धीरे आप अपने ही समाज को दोष की स्थायी कहानी में
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