सिंगूर : विकास की बाट जोह रहा राजनीति का कुरुक्षेत्र
हुगली, 08 जनवरी (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है, जिसने बीते दो दशकों के दौरान राज्य की राजनीति को एक अलग दिशा दी है। सिंगूर केवल एक औद्योगिक परियोजना का स्थल नहीं रहा, बल्कि वह राजनीतिक बदलाव का प्रतीक बन गया। टाटा मोटर्स
सिंगूर की खाकी पड़ी हुई जमीन


हुगली, 08 जनवरी (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है, जिसने बीते दो दशकों के दौरान राज्य की राजनीति को एक अलग दिशा दी है। सिंगूर केवल एक औद्योगिक परियोजना का स्थल नहीं रहा, बल्कि वह राजनीतिक बदलाव का प्रतीक बन गया। टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के खिलाफ हुए भूमि आंदोलन ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से उलट दिया और 2011 में सत्ता परिवर्तन की नींव रखी। दुर्भाग्य से सत्ता परिवर्तन के बाद भी सिंगुर के लोगों का भाग्य नहीं खुल सका। कोई आज भी इस क्षेत्र के विकास की प्रतीक्षा ही कर रहे हैं। यही वजह है कि सिंगूर आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले लोग भी अफसोस जताते नजर आ जाते हैं।

साल 2006-08 के दौरान वाम मोर्चा सरकार द्वारा टाटा मोटर्स को जमीन देने के फैसले के खिलाफ सिंगूर में व्यापक आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन की अगुवाई तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने की। किसानों की जमीन, जबरन अधिग्रहण और औद्योगीकरण बनाम कृषि जैसे मुद्दों ने जनभावना को झकझोर दिया। यही आंदोलन बाद में वाम मोर्चा के 34 वर्षों के शासन के अंत और तृणमूल कांग्रेस की सत्ता में वापसी का सबसे बड़ा कारण बना।

सिंगूर आंदोलन के कारण टाटा मोटर्स को अंततः पश्चिम बंगाल छोड़कर गुजरात जाना पड़ा। यह केवल एक कारखाने का स्थानांतरण नहीं था, बल्कि इससे बंगाल की औद्योगिक छवि को गहरा झटका लगा। निवेशकों के बीच यह संदेश गया कि राज्य में उद्योग स्थापित करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। इसके बाद कई वर्षों तक बंगाल को उद्योग विरोधी राज्य के रूप में देखा गया।

टाटा के सिंगूर से चले जाने के 18 साल बाद आज हालात पर आत्ममंथन हो रहा है। आंदोलन के समय जो नेता सबसे आगे थे, उन्हीं की आवाज़ में अब निराशा झलक रही है। सिंगूर के पूर्व तृणमूल विधायक रवींद्रनाथ भट्टाचार्य का कहना है कि सत्ता में आने के बाद तृणमूल सरकार ने सिंगूर को भुला दिया। न वहां कोई बड़ा उद्योग आया और न ही जमीन को पूरी तरह कृषि योग्य बनाया जा सका।

सिंगूर पंचायत समिति के पूर्व शिक्षा कर्माध्यक्ष दूधकुमार धाड़ा और तृणमूल के पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष महादेव दास भी मानते हैं कि आंदोलन के बाद क्षेत्र को जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए। जिन जमीनों को कृषि योग्य बताया गया, उनमें से बड़ी हिस्सेदारी आज भी उपजाऊ नहीं है। उद्योग न होने से रोजगार के अवसर नहीं बने और स्थानीय अर्थव्यवस्था ठहराव की स्थिति में पहुंच गई।

विडंबना यह है कि जिन लोगों ने कभी कारखाने का विरोध किया, वही आज यह कह रहे हैं कि अगर टाटा की फैक्ट्री होती तो क्षेत्र में रोजगार, दुकानें, सहायक उद्योग और आर्थिक गतिविधियां विकसित होतीं। यह बदलाव सिंगूर आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक सीख के रूप में देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिंगूर में प्रस्तावित दौरा इस मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ले आया है। विपक्ष, खासकर भाजपा, सिंगूर को तृणमूल सरकार की विफलताओं के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है। सवाल उठाया जा रहा है कि सत्ता में आने के बाद तृणमूल सरकार सिंगूर के लिए क्या कर पाई।

आज सिंगूर पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन अहम प्रतीकों का प्रतिनिधित्व करता है—आंदोलन के जरिए सत्ता परिवर्तन, औद्योगीकरण को लेकर राजनीतिक दुविधा और सत्ता में आने के बाद विकास के वादों की हकीकत। यह स्थान याद दिलाता है कि केवल आंदोलन से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नीति और विकास से ही किसी क्षेत्र का भविष्य तय होता है।

बहरहाल, सिंगूर में तीत की राजनीतिक जीत, वर्तमान की निराशा और भविष्य की अनिश्चितता एक साथ खड़ी दिखाई देती है। सिंगूर यह सवाल छोड़ जाता है कि राजनीति और विकास के टकराव में अंततः कीमत किसे चुकानी पड़ती है—और यही प्रश्न इसे पश्चिम बंगाल की राजनीति में हमेशा प्रासंगिक बनाए रखता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय