गाय के बछड़ों के लिए हुआ भव्य पालना व नामकरण संस्कार, गदग के रामगिरी गांव में दिखी अनोखी परंपरा
गदग, 07 जनवरी (हि.स.)। कर्नाटक के गदग जिले के लक्ष्मेश्वर तालुक अंतर्गत रामगिरी गांव में बुधवार को एक दुर्लभ और मनमोहक पारंपरिक आयोजन देखने को मिला, जहां एक किसान परिवार ने बच्चों के समान गाय के बछड़ों के लिए भव्य पालना और नामकरण संस्कार का आयोजन क
Cow naming


गदग, 07 जनवरी (हि.स.)। कर्नाटक के गदग जिले के लक्ष्मेश्वर तालुक अंतर्गत रामगिरी गांव में बुधवार को एक दुर्लभ और मनमोहक पारंपरिक आयोजन देखने को मिला, जहां एक किसान परिवार ने बच्चों के समान गाय के बछड़ों के लिए भव्य पालना और नामकरण संस्कार का आयोजन किया। यह अनोखा कार्यक्रम न केवल गांव, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी चर्चा का विषय बना।

इस आयोजन में धार्मिक आस्था, परंपरा और कृषि संस्कृति के मूल्यों की जीवंत झलक देखने को मिली। रामगिरी गांव के किसान नागराज मडिवालर के घर की गाय ने दो सुंदर जुड़वा बछड़ों को जन्म दिया। इस खुशी को परिवार ने उत्सव के रूप में मनाते हुए पूरे विधि-विधान के साथ पालना संस्कार आयोजित किया। करीब 15 दिन पहले उसी गाय के लिए सीमंत संस्कार भी कराया गया था।

पालना और घर के सामने के परिसर को नारियल के पत्तों, तोरण, कोमल हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया था, जिससे पूरा वातावरण उत्सवमय बन गया।

पालना कार्यक्रम में फूलशिगली विरक्त मठ के चन्नवीर महास्वामी तथा गंजीगट्टी चरमूर्तेश्वर मठ के डॉ. वैजनाथ शिवलिंग महास्वामी विशेष रूप से उपस्थित रहे। मठाधीशों की उपस्थिति में पारंपरिक सोबान गीत गाए गए और बछड़ों को पालने में झुलाया गया।

कार्यक्रम के दौरान शुभ घड़ी और मुहूर्त में मठाधीशों ने बछड़ों के कान में नाम पुकारकर नामकरण संस्कार संपन्न कराया। गाय से जन्मे जुड़वा बछड़ों का नाम “शिव” और “बसव” रखा गया, जो धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है।

इस अवसर पर मठाधीशों ने किसानों के जीवन में गाय और बछड़ों के महत्व, कृषि संस्कृति की गरिमा तथा प्रकृति के साथ मानव के गहरे संबंध पर अपने विचार साझा किए। सैकड़ों ग्रामीणों की उपस्थिति में संपन्न यह आयोजन श्रद्धा और उल्लास से भरपूर रहा।

आमतौर पर बच्चों के लिए किया जाने वाला पालना संस्कार जब गाय के बछड़ों के लिए इतनी भक्ति और उत्साह के साथ संपन्न हुआ, तो ग्रामीणों ने इसे “कृषि संस्कृति का जीवंत उदाहरण” बताया। हसु–बछड़ों को परिवार के सदस्य के समान मानने की किसानों की भावना इस आयोजन में स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

रामगिरी गांव में आयोजित यह अनोखा पालना और नामकरण कार्यक्रम ग्रामीण भारत की परंपराओं, आस्थाओं और कृषि जीवनशैली के महत्व को एक बार फिर उजागर करता है।---------------

हिन्दुस्थान समाचार / राकेश महादेवप्पा