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उज्जैन, 05 जनवरी (हि.स.)। विश्व के प्राचीनतम् साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित हमारे चारों वेद न केवल इस देश की धरोहर है अपितु संसार की समस्त विद्याओं के मुलाधार हैं। इनकी रक्षा होने से ही समस्त विद्याओं कलाओं की रक्षा तथा हमारी सनातन संस्कृति की पर परा जीवित रह सकेगी। यह बात श्री त्रिपुरसुन्दरी संस्थान के अधिष्ठाता वेदमूर्ति पं. उमेश शर्मा ने सोमवार को मध्य प्रदेश के उज्जैन की कालिदास संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित कल्पवल्ली समारोह के द्वितीय दिवस कही। उन्होंने कहा कि संसार के एकमात्र वेद ऐसे ग्रन्थ हैं जो स पूर्ण विश्व के कल्याण की कामना करते हैं। वेदों के प्रचार-प्रसार की आज के युग में अत्यन्त आवश्यकता है।
स्वागत भाषण कालिदास संस्कृत अकादमी के निदेशक डॉ. गोविन्द गन्धे ने दिया। उन्होंने कहा कि वेदों की पूर्व में अनेक शाखाएं विद्यमान थीं, किन्तु उन शाखाओं के अध्येताओं में निरन्तर कमी होने के कारण आज वेदों की अनेक शाखाएं समाप्त प्राय: हो गई हैं। हमें अपनी इस प्राचीन विद्या पर परा को धरोहर के रूप में सहेज कर रखना आवश्यक है अन्यथा आने वाले दिनों में आज जो शाखाएं उपलब्ध हैं वे भी समाप्त प्राय: हो जाएंगी और स पूर्ण विश्व इस ज्ञान की स पत्ति से वंचित हो जाएगा।
प्रथम सत्र में सामवेद की राणायनीय, जैमिनी, कौथुम शाखा का स्वाध्याय हुआ। द्वितीय सत्र में शुक्ल यजुर्वेद की माध्यादिनी शाखा तथा काण्वशाख का एवं कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय, मैत्रायणी शाखा का स्वाध्याय हुआ। शाखा स्वाध्याय में कु. भकोणम, बैल्लूर, त्रिपुरा, अगरतला, राजगीर, नईदिल्ली, वारणसी, परभणी, स भाजीनगर आदि स्थानों से वेदों के विद्वानों ने किया। सभी वेदपाठियों का अकादमी द्वारा सम्मान किया गया। प्रथम सत्र का संचालन सौरभ नौटियाल ने तथा द्वितीय सत्र का संचालन सत्यम् शुक्ल ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ समाजसेवी श्रीपाद जोशी, ज्योतिषाचार्य सर्वेश्वर शर्मा, नाट्य निर्देशक शरद शर्मा, समाजसेवी गोपाल महाकाल, लोक कलाकार कृष्णा वर्मा उपस्थित थे। आभार कार्यक्रम संयोजक डॉ. सन्दीप नागर ने माना।
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हिन्दुस्थान समाचार / ललित ज्वेल